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'मैंने 12 मण लकड़ी रखी है; इतनी ही लगेगी मुझे...': नाना पाटेकर के वो डायलॉग्स, जो हंसाते हुए भी सोचने पर मजबूर करते हैं

Published: Thu, 08 Oct 2026 06:50 PM (GMT+05:30)

नाना पाटेकर के संवादों और अभिनय ने दर्शकों के दिलों में गहरी छाप छोड़ी है, जो आम आदमी की आवाज ...और पढ़ें

नाना पाटेकर

नाना पाटेकर

HighLights

  1. संवादों में आम आदमी की आवाज, अभिनय में किरदार की पूरी सच्चाई दिखी

  2. क्रांतिवीर से अब तक, नाना के संवाद लोगों की जुबान पर कायम हैं

जागरण संवाददाता, मुरादाबाद। क्रांतिवीर वह पहली फिल्म थी, जिसमें नाना पाटेकर को टेलीविजन पर देखा। औसत कद-काठी, सांवला रंग, लेकिन जैसे ही जुबान खुलती, लगता अंगार बरस रहे हों। ‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने...’ और ‘ये मुसलमान का खून, ये हिंदू का खून... बता इसमें मुसलमान का कौन सा, हिंदू का कौन सा?’ जैसे संवादों ने कई दिनों तक जहन पर कब्जा किए रखा।

फिर फिल्मों में गोरे-चिट्टे स्मार्ट हीरो दिखते रहे और नाना साहब कहीं पीछे छूट गए। इसके बाद तिरंगा के इंस्पेक्टर वागले नजर आए। राजकुमार के साथ उनका ‘पीले-पीले ओ मोरे राजा’ वाला अंदाज याद रह गया।

अंकुश और परिंदा में उनका अभिनय देखा तो लगा कि यह अभिनेता किरदार नहीं निभाता, उसे अपने भीतर उतार लेता है। उनके निधन की खबर फिल्म प्रेमी और थियेटर आर्टिस्टों को हुई तो शोक छा गया। एक अच्छे और बेबाक अभिनेता के चले जाने पर लोगों ने दुख का इजहार किया।

प्रसिद्ध शायर मंसूर उस्मानी बताते हैं कि नाना पाटेकर जीवंत किरदार निभाते थे। नाना साहब की खासियत हमेशा यही लगी कि वह जब बोलते थे तो कोई फिल्मी किरदार नहीं, बल्कि हमारे आसपास का कोई आम इंसान बोलता हुआ महसूस होता था।

उनका गुस्सा, हास्य, संजीदगी और मन की बात कहने का ढंग सीधे भीतर उतरता था। उनका एक संवाद है ‘बेटा, मैंने अपनी 12 मण लकड़ी रखी है। इतनी ही लगेगी मुझे। गीली लकड़ी में मत जलाना। धुआं आएगा।

दोस्त लोग और अगल-बगल के सब लोग आएंगे, उनकी आंखों में पानी आएगा। मरते वक्त गलतफहमी होगी कि मेरे लिए रो रहे हैं। शायद यही नाना पाटेकर की खासियत थी, हंसा भी दिया, सोचने पर मजबूर भी किया और बहुत कुछ दिखाकर सबकुछ छिपा गए।

नाना पाटेकर का अभिनय हमेशा सहज लगा। उनके संवाद बोलने का अंदाज अलग है। वह संवाद को केवल बोलते नहीं थे, बल्कि उसमें भाव भर देते थे। यही वजह है कि उनके कई संवाद लोगों को याद हैं और सामान्य बातचीत में भी दोहराए जाते हैं। - आरएन वाजपेयी, सीनियर आर्टिस्ट।

नाना पाटेकर के संवाद जीवंत हैं। उनकी आवाज और बोलने का तरीका ही किरदार को अलग पहचान देता है। चाहे गुस्से वाला संवाद हो या भावुक दृश्य, वह सीधे दिल पर असर करता है। उनके अभिनय की सबसे बड़ी खूबी यही है कि पर्दे पर सबकुछ बहुत स्वाभाविक लगता है। - शुभि कसेरा, सिविल लाइंस।

क्रांतिवीर मैंने करीब 12 बार देखी है। हर बार नाना पाटेकर का अभिनय कुछ नया महसूस कराता है। उनके संवाद सिर्फ संवाद नहीं लगते, बल्कि ऐसा लगता है जैसे कोई अपने सामने खड़े होकर सच बोल रहा हो। यही वजह है कि उनके कई किरदार आज भी जहन में बसे हैं। - हिमांशु वर्मा, फिल्म प्रेमी।

नाना पाटेकर की एक से बढ़कर एक फिल्में हैं, जिनमें उन्होंने अलग-अलग किरदार निभाए। खास बात यह है कि हर किरदार को उन्होंने अपनी अलग पहचान दी और उसे जीवंत कर दिया। उनके अभिनय में बनावटीपन कम और भावनाएं ज्यादा नजर आती हैं। यही उन्हें खास बनाता है। - दीक्षा जोशी, आर्टिस्ट।

अब तक छप्पन मैंने अनगिनत बार देखी है। नाना पाटेकर के अभिनय में सबसे ज्यादा सच्चाई महसूस होती है। वह जिस किरदार में आते हैं, उसे पूरी तरह अपना बना लेते हैं। उनके संवाद, चेहरे के भाव और बोलने का अंदाज मिलकर किरदार को यादगार बना देते हैं। - राजेंद्र टंडन, अभिनेता के प्रशंसक

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