गन्ने की हर कतार में 'मौत का डर': 27 हमलों में 5 की मौत, 150 गांवों में तेंदुओं की दहशत
मुरादाबाद के गन्ने के खेतों में तेंदुओं का आतंक बढ़ गया है, जिससे किसानों में मौत का डर सता रहा ...और पढ़ें

एआई इमेज है।
HighLights
खेत जाने की मजबूरी ने बदल दी जिंदगी
मोहसिन पाशा, मुरादाबाद। रामगंगा नदी के खादर में सुबह सूरज निकलते ही किसान गन्ने के खेतों में पहुंच जाते थे और शाम तक मेहनत करते थे। अब यही खेत तेंदुओं का घर बन जाने पर डर की वजह बन गए। खेत में काम करने वाला किसान यह नहीं जानते कि गन्ने की कतार के पीछे फसल है या मौत। इसलिए तेंदुए से खौफजदा होकर अपनी फसल तक देखने जाने से डरते हैं।
जंगल से गांवों तक बढ़े तेंदुओं के दायरे ने किसानों की जिंदगी की बेफिक्री छीन ली है। वर्ष 2026 में जनवरी से अब तक जिले में तेंदुओं ने 27 लोगों पर हमला किया है। पांच लोगों की जान जा चुकी है।
तीन अगस्त को लालापुर पीपलसाना की संतोष देवी, 19 अगस्त को बलिया की विरमो देवी और 25 अगस्त को इसी गांव की मिथलेश सैनी तेंदुए का शिकार बनीं। तीनों पर खेत पर काम करते समय तेंदुओं ने हमला करके जान ली।
29 अगस्त को बलिया गांव के ही दिव्यांग जगराज सैनी को तेंदुआ घर से खींचकर गन्ने के खेत में ले गया और मार डाला। इतना ही नहीं खेत में उसका मांस नोचकर खा गया। इन घटनाओं ने ग्रामीणों के दिल में ऐसा डर बैठाया कि अंधेरा होने के बाद गांव की खामोशी डराने लगी।
मुरादाबाद में जंगल में 100 से अधिक से तेंदुए हैं। ग्राम बलिया में 27 दिन में तीन घटनाओं ने ग्रामीणों के सब्र का बांध तोड़ दिया था। हंगामे के बाद अधिकारी और जनप्रतिनिधि पहुंचे।
वन विभाग और पुलिस ने निगरानी, स्थान का पता लगाने और तेंदुओं को पकड़ने का अभियान तेज हुआ। तेंदुओं का यह खौफ अचानक पैदा नहीं हुआ। वर्ष 2012 में पहली बार कांठ क्षेत्र में तेंदुआ दिखाई दिया था। उसने बकरी को निवाला बनाया।
इसके बाद उत्तराखंड के पहाड़ों के जंगलों से जिम कार्बेट पार्क का गलियारा कहे जाने वाले अमानगढ़ टाइगर रिजर्व, बिजनौर से तेंदुओं का मुरादाबाद के जंगलों की ओर आने का सिलसिला शुरू हुआ।
रामगंगा नदी के किनारे शिकार करते-करते उन्होंने पानी के रास्ते अपना दायरा बढ़ाया। धीरे-धीरे मुरादाबाद के जंगल और फिर गन्ने के खेत उनका ठिकाना बन गए। वन विभाग के अनुसार जिले के करीब 150 गांव तेंदुआ प्रभावित हैं।
कांठ और ठाकुरद्वारा तहसील के अधिकतर गांवों में इनका खौफ है। मुरादाबाद तहसील के कुछ गांवों में भी तेंदुए देखे गए हैं। बिलारी में भी मौजूदगी सामने आई है, हालांकि वहां स्थिति उतनी गंभीर नहीं है।
सबसे ज्यादा परेशानी रामगंगा नदी किनारे तराई के 52 गांवों में है। बाढ़ का पानी आने पर गन्ने के खेतों में छिपे तेंदुओं का ठिकाना भी बदल जाता है। पानी से बचने के लिए वे सूखे स्थलों व आबादी की ओर बढ़ते हैं।
कभी मचान पर, कभी दीवार के पास तो कभी सड़क पर चहलकदमी करते तेंदुए दिखाई देने लगते हैं। गन्ने की कटाई शुरू होने पर भी उनका छिपने का सुरक्षित ठिकाना उजड़ता है और वे खुले में दिखाई देने लगते हैं।
इस डर ने गांव के लोगों की दिनचर्या बदल दी है। बच्चे स्कूल जाने से घबराते हैं। महिलाएं खेतों की ओर जाने से बच रही हैं। पशुओं के लिए चारा लेने और खेती का काम करने की मजबूरी फिर भी ग्रामीणों को खेतों तक खींच ले जाती है। रात में लोग टोली बनाकर पहरा दे रहे हैं।
घरों के भीतर बैठे परिवारों की नजर बाहर के हर आहट पर टिक जाती है। लगातार दबाव के बाद वन विभाग ने अभियान बढ़ाया। इस साल अब तक 29 तेंदुए पिंजरों में कैद किए जा चुके हैं। इनमें से तीन अगस्त के बाद 14 तेंदुओं को पकड़कर रेस्क्यू सेंटर भेजा गया।
वन विभाग की टीमें लगातार तेंदुओं को पकड़ रही हैं। अभी भी जंगल में तेंदुए दिखाई देने के साथ हमले होने की घटनाएं हो रही हैं। मंगलवार को भी एक युवती पर खेत पर काम करते हुए तेंदुए ने हमला किया है। ग्रामीणों को सावधानी के साथ खेतों पर जाना होगा, तभी घटनाएं रुकेंगी। बिजनौर में जागरुकता से ही तेंदुए से हमलों की घटनाएं कम हुई हैं।
- आदर्श कुमार, वन संरक्षक, मुरादाबाद मंडल
यह भी पढ़ें- मुरादाबाद के कांठ में फंसा 15वां तेंदुआ: ग्रामीणों ने ली राहत की सांस, पर दहशत अब भी बरकरार
यह भी पढ़ें- पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बड़ा बदलाव: अब सप्त सरोवर में मिलेंगे AC हट, ऑनलाइन बुकिंग और सफारी के नए नियम लागू
