स्मार्टफोन बना रहा आक्रामक? 8 साल के बच्चे की हरकत ने उड़ाए होश, साइकोलॉजिस्ट ने दी चेतावनी
बच्चों में बढ़ती आक्रामकता और हिंसक प्रवृत्ति चिंता का विषय बन गई है, जिसमें मोबाइल गेम, इंटरनेट सामग्री और पारिवारिक माहौल की अहम भूमिका है।

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HighLights
विशेषज्ञों ने जताई चिंता, कहा परिवार के माहौल का असर व्यवहार पर
आभाषी दुनिया में जी रहे बच्चे, गेम की लाइफलाइन को मान रहे असल
जागरण संवाददाता, मुरादाबाद। बच्चों में छोटी उम्र से ही आक्रामक व्यवहार और हिंसक प्रवृत्ति के मामले चिंता बढ़ा रहे हैं। हाल ही में चंडीगढ़ के पंचकूला के एक सरकारी स्कूल में आठ साल के बच्चे की ओर से तीन साल की बच्ची के साथ की गई। विद्यालय में हुई इस हिंसा ने बच्चों के व्यवहार और उनकी मानसिकता को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामले ने विशेषज्ञों में भी चिंता बढ़ा दी है कि आखिर इतनी कम उम्र में बच्चों के मन में हिंसा का भाव कैसे पनप रहा है। उनका मानना है कि मोबाइल गेम, इंटरनेट पर दिखने वाला हिंसक कंटेंट या घर का माहौल जिम्मेदार है।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बच्चों का व्यवहार उनके आसपास के वातावरण, अनुभवों और परवरिश से काफी प्रभावित होता है। बढ़ते मोबाइल के प्रयोग और स्क्रीन का असर बच्चों का व्यवहार बदल रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल और इंटरनेट की बढ़ती पहुंच ने भी बच्चों के सामने हिंसक दृश्य और कंटेंट की उपलब्धता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों को डांटने या सजा देने के बजाय उनसे संवाद करना, उनकी भावनाओं को समझना और जरूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिक परामर्श दिलाना जरूरी है।
स्कूल और परिवार दोनों की जिम्मेदारी है कि बच्चों में आक्रामकता के शुरुआती संकेतों को पहचानकर समय रहते मदद उपलब्ध कराएं। बच्चों में गुस्सा आना या कभी-कभार दूसरे बच्चों से झगड़ना सामान्य व्यवहार हो सकता है।
मगर, बार-बार मारपीट करना, दूसरों को चोट पहुंचाना, छोटी-छोटी बातों पर हिंसक प्रतिक्रिया देना और दूसरे के दर्द को नजरअंदाज करना चिंता का विषय हो सकता है।
बच्चे को गेम लग रही असल जिंदगी
विशेषज्ञों का कहना है कि काउंसलिंग के दौरान कई ऐसे मामले सामने आये हैं। जहां बच्चे गेम में मिलने वाली लाइफलाइन को असल जिंदगी समझ रहे हैं।
बच्चे गेम में जिस तरह लाइफलाइन मिलती है, उसे सच मानकर अपने आस-पास सहपाठी और परिवार के साथ बर्ताव करने लगते हैं। उनका कहना है कि ऐसे बच्चे आभाषी जीवन को सच मान रहे हैं।
विशेषज्ञों की बात
हमारे यहां भी शहर में इस तरह के मामले देखने को मिल घर का माहौल खराब होने के कारण या गेम और माेबाइल के अधिक के प्रयोग के कारण असल जिंदगी को नहीं समझ पा रहे हैं। ऐसे में वो जिंदगी को गेम समझकर अक्रामक होने पर यह समझते है कि मारने पर सामने वाले के पास लाइफ लाइन है। वहीं परिवार में होने वाली हिंसा और दुर्व्यवहार का असर भी उनमें दिख रहा है। - डाॅ. कुमार मंगलम सारस्वत, मंडलीय मनोवैज्ञानिक।
ऐसा अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि बच्चों के भावनात्मक विकास और व्यवहार पर गंभीर चिंता का विषय है। बच्चों में बढ़ती आक्रामकता के पीछे पारिवारिक वातावरण, हिंसक दृश्य सामग्री, भावनात्मक उपेक्षा और संवेदनशीलता के अभाव जैसे अनेक कारण हो सकते हैं। केवल दंडित करना समाधान नहीं है, उनके व्यवहार के पीछे छिपे कारणों को समझना आवश्यक है। स्कूल और परिवार दोनों को बच्चों में संवेदना, आत्मनियंत्रण, सहानुभूति और दूसरों के प्रति सम्मान करने के लिए प्रयास करने होंगे। - मेजर डाॅ. मीनू मेहरोत्रा, मनोवैज्ञानिक एवं मनोविश्लेषक
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