विंध्याचल के तीर्थ पुरोहितों के पास 14वीं शताब्दी तक के यजमानों का विवरण, कश्मीरी पंडितों से गहरा नाता
विंध्याचल के तीर्थ पुरोहितों का संबंध पाकिस्तान व नेपाल के राजघरानों और कश्मीरी पंडितों से रहा है।

HighLights
विंध्याचल पुरोहितों के पाकिस्तान व नेपाल राजघरानों से संबंध।
कश्मीरी पंडितों का आठ पीढ़ियों से पुरोहितों से नाता।
नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों ने भी किए मां के दर्शन।
प्रशांत यादव, मीरजापुर। सरहदें बदलीं, रियासतें इतिहास बन गईं, लेकिन विंध्याचल में आस्था के रिश्ते आज भी कायम हैं। पाकिस्तान के लाहौर के कश्मीरी पंडितों से लेकर नेहरू-गांधी परिवार और राजा-महाराजाओं तक का नाता मां विंध्यवासिनी के दरबार से जुड़ा है। यहां के तीर्थ पुरोहितों के पास सुरक्षित बहीखातों में वहां यजमानों के आगमन और धार्मिक परंपराओं से जुड़े विवरण दर्ज हैं। तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, उनके पास 14वीं शताब्दी तक के यजमानों का विवरण उपलब्ध है।
लाहौर व पेशावर के कश्मीरी पंडित भी दर्शन करने आए
तीर्थ पुरोहितों के बहीखाते में लाहौर के चौक बाजार निवासी पंडित कृष्ण लाल शास्त्री, पंडित डिल्ली डरवा और पंडित लक्ष्मी राम, पुत्र गणेश कौल के नाम दर्ज हैं। यह लोग संवत 1968 में मां विंध्यवासिनी के दर्शन-पूजन के लिए आए थे। इनके तीर्थ पुरोहित रामजी पांडेय थे। उनके वंशज सुमित पांडेय आज भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
सुमित पांडेय का कहना है कि पाकिस्तान के कश्मीरी पंडित आज उत्तराखंड के देहरादून में आकर बसे हुए हैं। उनकी कुल देवी श्रीनगर में हैं। उनका दर्शन करने के बाद यह लोग प्रतिवर्ष विंध्याचल भी मां विंध्यवासिनी का दर्शन-पूजन करने आते हैं। उनसे हमारा आठ पीढ़ियों से पुराेहित का नाता रहा है।
मोतीलाल नेहरू और स्वरूप रानी भी पहुंचे थे विंध्याचल
नेहरू-गांधी परिवार का भी विंध्याचल से पुराना धार्मिक संबंध रहा है। पुरोहितों के विवरण के अनुसार, मोतीलाल नेहरू और स्वरूप रानी संवत 1979 में मां विंध्यवासिनी के दर्शन-पूजन के लिए आए थे। इसके बाद परिवार की अगली पीढ़ियों के सदस्यों के आगमन का भी उल्लेख मिलता है। मोतीलाल नेहरू की बहन राजन नेहरू वर्ष 1962 में, इंदिरा गांधी चार अप्रैल 1980, 17 मई 1981 और 10 जून 1981 को, सोनिया गांधी 20 फरवरी 2002 तथा राहुल गांधी दो नवंबर 2011 को विंध्याचल आए थे। इनके आगमन के विवरणों से जुड़े पुरोहित के रूप में रामजी पांडेय का नाम बताया जा रहा है। उनके वंशज इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
1987 में राजा क्षत्रशाल सिंह ने किया था दर्शन
राजपरिवारों और विंध्याचल के पुरोहितों के संबंधों की एक कड़ी वर्ष 1987 से जुड़ी है। उस वर्ष राजा क्षत्रशाल सिंह मां विंध्यवासिनी के दर्शन-पूजन के लिए आए थे। शेरपुर कोठी के पुरोहित मिट्ठू मिश्रा के परिवार के सदस्यों ने उन्हें दर्शन-पूजन कराया था। नेपाल के राजपरिवार सहित अन्य राजघरानों के सदस्यों के भी विंध्याचल आने की जानकारी पुरोहित परिवारों की ओर से दी जाती है। नेपाल के राजपरिवार से जुड़े पुरोहितों में तरुण पांडेय, छेरहा घराना और मृत्युंजय पांडेय के नाम बताए जाते हैं।
पीढ़ियों का इतिहास
विंध्याचल के तीर्थ पुरोहितों के बहीखाते केवल यजमानों के नाम दर्ज करने तक सीमित नहीं हैं। इनमें परिवारों, उनके मूल निवास और तीर्थयात्रा से जुड़े विवरण भी मिलते हैं। इन अभिलेखों के आधार पर अलग-अलग कालखंडों में विंध्याचल आने वाले परिवारों और उनके पुरोहितों के संबंधों का इतिहास समझा जा सकता है। राजशाही के दौर से लेकर आधुनिक समय तक चले आ रहे यह संबंध विंध्याचल की तीर्थ परंपरा की निरंतरता को सामने लाते हैं।
कश्मीरी पंडित गज्जोमल से मां विंध्यवासिनी का दर्शन-पूजन करने का शुरू हुआ था दौर
कश्मीरी पंडित गज्जोमल अपने परिवार के साथ संभवत: आजादी के पहले मां विंध्यवासिनी का दर्शन-पूजन करने अपने परिवार के साथ आए थे। उसी समय से माता प्रसाद पांडेय और उनके बेटे रामजी पांडेय उनके पुरोहित बन गए थे। बंटवारा के बाद इनके पूर्वज देहरादून में आकर बस गए। नागर मल के नाम से दिल्ली में आज भी रोड है। इनकी पेपर की मिल थी।
