'आखिरी 200 मीटर में ठान लिया था मेडल लेकर ही जाना है', पारुल चौधरी ने साझा की एशियन गेम्स में इतिहास रचने की इनसाइड स्टोरी
Parul Chaudhary: एशियन गेम्स में लगातार दूसरी बार दोहरे पदक जीतकर मेरठ की बेटी पारुल चौधरी ने इतिहास रचा। शहर ...और पढ़ें

बहन और कोच के साथ एशियन गेम्स में लगातार दूसरी बार दोहरे पदक जीतने वाली पारुल चौधरी (मध्य में)
HighLights
एशियन गेम्स में लगातार दूसरी बार दोहरे पदक जीतकर इतिहास रचा।
माता-पिता के समर्थन और कोच के अनुशासन को सफलता का श्रेय।
जागरण संवाददाता, मेरठ। एशियन गेम्स में लगातार दूसरी बार दोहरे पदक जीतकर इतिहास रचने वाली मेरठ की बेटी पारुल चौधरी शुक्रवार को अपने शहर लौटीं तो स्वागत में पूरा माहौल भावुक हो उठा। ढोल-नगाड़ों, फूल-मालाओं और नोटों की मालाओं के बीच पारुल के चेहरे पर पदक जीतने की खुशी के साथ अपने लोगों से मिलने का सुकून भी साफ दिखाई दिया।
देश के लिए पदक जीतने वाली इस बेटी ने बताया कि 5000 मीटर की दौड़ के आखिरी 200 से 250 मीटर में उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि अब यहां से मेडल लेकर ही जाना है।
पारुल ने कहा कि पिछली बार भी वह दो पदक लेकर गई थीं और इस बार भी दो पदक लेकर लौटी हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार पदकों का रंग बदल गया। खास बात यह है कि उनके पास अब एशियन गेम्स के तीनों रंग के पदक हैं।
14 साल की लगातार मेहनत, कठिन ट्रेनिंग, माता-पिता का अटूट समर्थन और कोच गौरव त्यागी का अनुशासन उनकी सफलता की कहानी का आधार है। दैनिक जागरण के खेल संवाददाता अमित तिवारी ने पारुल चौधरी से उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि, संघर्ष, परिवार, प्रशिक्षण और भविष्य के लक्ष्य पर खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश—
सवाल : पारुल, आपका बहुत-बहुत स्वागत है और दोहरे पदक के लिए बधाई। आखिरी लैप और खासकर आखिरी 100 मीटर के उन लम्हों को आपने कैसे जिया?
पारुल चौधरी : सबसे पहले आपको थैंक्यू। जब देश के लिए मेडल लेकर आते हैं तो बहुत अच्छा लगता है। मैं जब भी ग्राउंड पर जाती हूं तो यही सोचती हूं कि अपना बेस्ट देना है। मुझे पता था कि 5000 मीटर में मुझसे चार लड़कियां काफी अच्छी थीं, लेकिन रेस के दौरान मेरे दिमाग में सिर्फ एक बात थी कि मुझे मेडल लेकर आना है।
जब आखिरी 200 या 250 मीटर बचा तो मैंने मन में तय कर लिया था कि अब यहां से मेडल जीतकर ही जाना है। पिछली बार दो मेडल लेकर गई थी, इस बार भी दो मेडल लेकर जाऊंगी। बस इस बार मेडल का कलर चेंज था। मुझे इस बात की भी खुशी है कि अब मेरे पास एशियन गेम्स के तीनों कलर के मेडल हो गए हैं।
सवाल : आप अपने गांव और देश की ऐसी इकलौती बेटी हैं, जिसने लगातार दो एशियन गेम्स में दो-दो पदक जीतने की उपलब्धि हासिल की है। अगली पीढ़ी और अपने साथ के खिलाड़ियों को क्या संदेश देना चाहेंगी?
पारुल चौधरी : सफलता दो-चार साल में नहीं मिलती। मुझे खुद 14 साल प्रैक्टिस करते-करते हो गए, तब जाकर यह सफलता मिली है। चाहे पढ़ाई का क्षेत्र हो या खेल का, अपनी ट्रेनिंग लगातार जारी रखें। अपने आप पर और अपने कोच पर भरोसा रखें।
2012 में जब मैं अपने कोच गौरव त्यागी के पास आई थी, तब उन्होंने मुझे और मेरी बहन प्रीति को लड़कों और आर्मी के लड़कों के साथ कठिन ट्रेनिंग कराई। अगर हमारा टाइम सही नहीं आता था तो वे हाथों पर स्टिक भी मारते थे। उस समय बुरा लगता था, लेकिन आज समझ आता है कि उसी अनुशासन और कठिन ट्रेनिंग ने हमें इस मुकाम तक पहुंचाया।
सवाल : इस स्तर की सफलता के लिए जिस तपस्या और संघर्ष की जरूरत होती है, वह आपके लिए कितनी जरूरी रही?
पारुल चौधरी : शुरुआत में जब हम ट्रेनिंग के लिए जाते थे तो गांव और आसपास के लोग कहते थे कि लड़कियां कुछ नहीं करेंगी, वापस आ जाएंगी और फिर शादी कर देंगे। लेकिन मेरे माता-पिता ने किसी की बात नहीं सुनी। उन्होंने हमें पूरा सपोर्ट किया।
मेरे दो भाई भी हैं, लेकिन माता-पिता ने भाइयों से ज्यादा हम दोनों बहनों पर ध्यान दिया। इसलिए मेरी इस पूरी यात्रा में मेरे माता-पिता का सबसे बड़ा रोल है।
अब जब मैं मेडल लेकर आती हूं तो वही गांव वाले कहते हैं कि हमें भी अपनी बेटी पारुल जैसी बनानी है। मैं दूसरी लड़कियों के माता-पिता से भी यही कहना चाहूंगी कि वे रिजल्ट के लिए जल्दबाजी न करें। बच्चों को चार से छह साल का समय दें, पूरा सपोर्ट करें और भरोसा रखें। रिजल्ट जरूर आएगा।
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सवाल : अब पारुल का अगला लक्ष्य क्या है?
पारुल चौधरी : अगले साल वर्ल्ड चैंपियनशिप है और उसके अगले साल ओलंपिक्स हैं। यही हमारा अगला टारगेट रहेगा। अभी तीन से पांच दिन घर पर समय बिताऊंगी, क्योंकि साल में एक बार ही घर आती हूं। इसके बाद दोबारा ट्रेनिंग शुरू करेंगे।
कोशिश रहेगी कि आगे भी देश, गांव, कोच, जिले और प्रदेश का नाम रोशन करूं।
सवाल : आप पुलिस अधिकारी भी हैं। एक पुलिस वुमेन के रूप में समाज की महिलाओं और माताओं को क्या संदेश देना चाहेंगी?
पारुल चौधरी : उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग के अधिकारी भी एयरपोर्ट पर मेरा स्वागत और सम्मान करने आए थे। यह मेरे लिए बहुत अच्छा और भावुक पल था।
मेरा यही संदेश है कि आप चाहे किसी भी क्षेत्र में हों, अपना 100 प्रतिशत योगदान दें। जो भी काम कर रहे हैं, उसमें पूरी मेहनत और समर्पण के साथ काम करें। अगर हम अपने काम के प्रति ईमानदार और समर्पित रहें तो सफलता जरूर मिलती है।
सवाल : एशियन गेम्स में भी कुछ देशों में अफ्रीकी खिलाड़ियों को उतारा। ऐसा न होने पर आपका भी स्वर्ण हो सकता था, इसे कितना उचित मानती हैं?
पारुल चौधरी : ऐसा होना तो नहीं चाहिए लेकिन यदि वर्ल्ड एथलेटिक्स इसकी अनुमति देता है तो ठीक है। हमें भी ऐसा करना चाहिए। हम भी और अधिक मेहनत करेंगे और देश के लिए पदक जीतेंगे।
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सुबह 5:30 बजे की असेंबली में पारुल और प्रीति मुझसे भी पहले पहुंच जाती थीं : गौरव त्यागी
सवाल : मेरठ की माटी से आपने ऐसी बेटियां तैयार की हैं। पारुल के बाद अगली पीढ़ी हमें कब देखने को मिलेगी?
कोच गौरव त्यागी : मैं भी इंतजार कर रहा हूं कि पारुल जैसी मेहनती बच्ची मुझे दोबारा मिले। पारुल का घर स्टेडियम से करीब 15-20 किलोमीटर दूर था और मेरा घर करीब ढाई किलोमीटर दूर। लेकिन सुबह 5:30 बजे की असेंबली में पारुल और प्रीति मुझसे भी पहले पहुंच जाती थीं।
यही उनका संघर्ष था। उन्होंने अपना आराम और सुविधाएं छोड़कर खेल को अपनाया। उनके माता-पिता का भी बहुत बड़ा योगदान है। उस समय जब लोग उन्हें रोकते थे, तब उन्होंने गांव में अपने बेटों को रखकर दोनों बेटियों को बाहर भेजा और उन्हें खेलने का मौका दिया।
पारुल और प्रीति दोनों ने खुद को साबित करके दिखाया। उन्होंने अपने माता-पिता के साथ-साथ मेरा सिर भी गर्व से ऊंचा किया है। ऐसी बेटियां मेहनत, अनुशासन और संघर्ष से बनती हैं।
पारुल की हर सफलता ने गर्व से ऊंचा किया सिर : प्रीति
सवाल : आप दोनों बहनों ने जब दौड़ना शुरू किया तो बेटियों में जागरूकता बहुत कम थी। अब कैसा लग रहा है?
प्रीति चौधरी : पारुल और मैंने जब दौड़ना शुरू किया तो हमारे कोच गौरव त्यागी ने काफी कड़ी मेहनत कराई। यही नतीजा था की पारुल इतनी उपलब्धियां तक पहुंच सकीं। मैं कुछ इंजरी के कारण आगे नहीं बढ़ सकी लेकिन ब्रेक के बाद लौटी और सीआईएसएफ तक पहुंची हूं।
वर्तमान में सीआईएसएफ के लिए ही खेलों में प्रतिभाग करती हूं लेकिन जब-जब पारुल मेडल जीतती हैं तो वह मुझे अपने मेडल जैसा ही लगता है और मुझे उसी गर्व की अनुभूति होती है। इन्हें देखकर अब गांव की बहुत सी लड़कियां खेलों में आगे बढ़ रहे हैं और अभिभावक भी उनका हौसला बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव जरूरी है और अच्छा भी है।
