माथे पर तिलक और जुबां पर राधे-कृष्ण, सात समंदर पार से ब्रज आए कान्हा के दीवाने; चढ़ा भक्ति का रंग
कार्तिक मास में रूस, अमेरिका और यूरोप से आए विदेशी श्रद्धालु ब्रजभूमि, विशेषकर गोवर्धन में कृष्ण भक्ति में लीन हैं, ...और पढ़ें

HighLights
विदेशी भक्त कार्तिक मास में ब्रज की परिक्रमा कर रहे हैं।
धोती-कुर्ता पहनकर राधे-कृष्ण का जाप करते दिख रहे हैं।
सेवा कार्यों और सात्विक भोजन का आनंद ले रहे हैं।
संवाद सूत्र, गोवर्धन (मथुरा)। भोर की पहली किरण के साथ गिरिराज परिक्रमा मार्ग पर गूंजता ‘हरे कृष्णा-हरे कृष्णा, राधे-राधे’ का संकीर्तन, माथे पर तिलक, गले में चंदन की माला और तन पर धोती-कुर्ता पहने विदेशी श्रद्धालुओं की कतारें। कोई हाथों में श्रीमद्भगवद्गीता लिए कृष्ण नाम में मगन है तो कोई भक्ति की धुन पर झूमता हुआ गिरिराजजी की परिक्रमा कर रहा है। कहीं राधाकुंड में राधारानी का पूजन हो रहा है तो कहीं गोशाला में गायों को फूलों से सजाकर उनकी सेवा की जा रही है।
कार्तिक में ब्रजभूमि का यह दृश्य मानो सात समंदर पार की संस्कृतियों को कृष्ण भक्ति के एक सूत्र में पिरो रहा है। रूस, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यूरोप से आए इन श्रद्धालुओं के लिए ब्रज केवल तीर्थ नहीं, आस्था और आत्मिक शांति का ऐसा ठिकाना बन गया है, जहां आने के बाद बार-बार लौटने का मन करता है।
भोर की धोती-कुर्ता, माथे पर तिलक और जुबां पर राधे-कृष्ण
ब्रज की संस्कृति में रंगे इन विदेशी भक्तों का आकर्षण केवल गिरिराजजी की परिक्रमा तक सीमित नहीं है। वे राधाकृष्ण की भक्ति के साथ यहां की सेवा परंपरा को भी अपना रहे हैं। कई श्रद्धालुओं ने राधा, मीरा, ललिता, कान्हा, बलदेव और सुदामा जैसे नाम रख लिए हैं। धोती-कुर्ता और पगड़ी पहने पुरुषों के साथ ब्रज की गोपियों जैसे परिधान धारण किए विदेशी महिलाएं भी भक्ति में लीन नजर आती हैं।
परिक्रमा को मानते हैं तपस्या, सेवा में भी जुटते हैं
रूस निवासी गौर दास गिरिराजजी की परिक्रमा के साथ साफ-सफाई और सेवा कार्यों में भी जुटे रहते हैं। उनका कहना है कि परिक्रमा एक प्रकार की तपस्या है। यहां शरीर को कष्ट देने के बाद जो आध्यात्मिक चेतना मिलती है, उसका अनुभव ब्रज की पवित्र धरती पर ही हो सकता है। रूस निवासी त्रिवेणी की भी ब्रज से गहरी आस्था जुड़ गई है। यह उनकी पांचवीं भारत यात्रा है।
आश्रमों में सात्विक भोजन की व्यवस्था
ब्रज में ठहरे विदेशी भक्तों के लिए विभिन्न आश्रमों में भोजन की व्यवस्था की गई है। दिन में पुलाव, खिचड़ी और पोहा परोसा जाता है, जबकि रात के भोजन में दाल-चावल, मीठे-खट्टे चावल, कढ़ी, पनीर की सब्जी, पूड़ी और मिश्रित सब्जियां शामिल रहती हैं। भोजन में मिर्च का उपयोग नहीं किया जाता। रात में गाय का दूध भी दिया जाता है।
