पशुपालकों की बल्ले-बल्ले: बकरी अनुसंधान ने बताईं ऐसी ट्रिक, अब कम लागत में दो-तीन गुना होगी कमाई
केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान, मथुरा, किसानों की आय बढ़ाने के लिए एकीकृत कृषि प्रणाली पर जोर दे रहा है। यह ...और पढ़ें

केंद्रीय बकरी अनुसंधान मथुरा।
HighLights
एकीकृत कृषि प्रणाली से किसानों की आय में वृद्धि
बकरी, मुर्गी पालन और वर्मी कंपोस्ट का संयोजन
कम लागत में दो से तीन गुना अधिक कमाई का तरीका
जागरण संवाददाता, मथुरा। किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की दिशा में केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान लगातार नए आयाम स्थापित कर रहा है। संस्थान अब पारंपरिक पशुपालन से हटकर इंटीग्रेटेड फार्मिंग (एकीकृत कृषि प्रणाली) पर विशेष जोर दे रहा है। इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से पशुपालक किसानों को कम लागत में तीन गुणी कमाई का तरीका बताया जा रहा है। इससे किसानों के जीवन स्तर में बदलाव आ सकेगा।
फरह के मखदूम स्थित केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान बकरी पालन के लिए न किसानों को प्रशिक्षित एवं जागरूक करता है। साथ ही उनकी मदद भी करता है।
अब तक अनुसंधान द्वारा बकरी पालन को बढ़ावा देने की ओर काम किया जा रहा था। जागरूक करने के साथ सरकार की योजना के तहत पालकों को किटें उपलब्ध कराई जा रहीं हैं। लेकिन, अब अनुसंधान के विज्ञानी पशुपालकों की आय एक लागत में दो से तीन गुणी करने का तरीका बता रहे हैं।
दो से तीन लाख रुपये में बकरी व मुर्गी पालन एवं वर्मी कंपोस्ट की करें व्यवस्था
अनुसंधान के निदेशक डॉ. मनीष कुमार चेटली ने बताया, एकीकृत कृषि प्रणाली के तहत पशुपालकों को केवल बकरी पालन तक सीमित रहने के बजाय, इसके साथ मुर्गी पालन और वर्मी कंपोस्ट (केंचुआ खाद) का एक साथ संयोजन करने की सलाह दी जा रही है। 20 बकरियों का पालन करने में करीब दो लाख रुपये खर्च आता है। सरकार द्वारा अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों को 50 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है। इसी अनुदान की राशि से मुर्गी पालन एवं कंपोस्ट की व्यवस्था की जा सकती है। यह बचत का अनूठा चक्र होगा।
दो से तीन लाख रुपये में बकरी व मुर्गी पालन एवं वर्मी कंपोस्ट की करें व्यवस्था
मनीष कुमार ने बताया कि बकरियों द्वारा छोड़ा गया व्यर्थ चारा और मिंगड़ी (मल) मुर्गियों के खाने के काम आता है, जिससे मुर्गियों के चारे पर होने वाला खर्च काफी हद तक कम हो जाता है। वहीं बकरियों व मुर्गियों के मल-मूत्र तथा बचे हुए जैविक कचरे का उपयोग केंचुआ के भोजन के रूप में किया जाता है। इससे उच्च गुणवत्ता वाली वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार होती है। उन्होंने बताया, इस तरीके से पशुपालक को करीब चार से पांच लाख रुपये की आय होगी।
