यूपी के मैनपुरी में 200 साल पुरानी अनोखी परंपरा, दशहरा पर नहीं एकादशी पर जलता है रावण
मैनपुरी में विजयादशमी के बजाय एकादशी को रावण दहन की 200 साल पुरानी अनोखी परंपरा है, जो महाराजा तेज सिंह ...और पढ़ें

फाइल फोटो।
HighLights
मैनपुरी में एकादशी को होता है रावण दहन।
यह परंपरा लगभग 200 साल पुरानी है।
महाराजा तेज सिंह जूदेव से जुड़ी है यह परंपरा।
जागरण संवाददाता, मैनपुरी। देश भर में भले ही विजयादशमी को रावण दहन की परंपरा है परंतु मैनपुरी की रामलीला एकदम अलग है। यहां एकादशी को रावण का अंत किया जाता है। यह परंपरा करीब 200 वर्ष पुरानी है और महाराजा तेज सिंह जूदेव की सवारी और भगवान श्रीराम के पूजन से जुड़ी हुई है।कुरावली, बेवर, भोगांव में भी अलग-अलग तिथियों में रावण का दहन किया जाता है।
रामलीला मैदान में प्रतिवर्ष श्राद्ध पर्व में ही रामलीला मंचन आरंभ हो जाता है। यहां तिथिवार मंचन चलता है। रामलीला में रावण के अंत का भी मंचन होता है लेकिन जहां देशभर में रावण के अहंकार का अंत विजयादशमी यानि दशहरा पर होता है वहीं जिले में यह एकादशी को होता है। यह परंपरा करीब 200 वर्ष से चली आ रही है।
महाराजा तेज सिंह जूदेव की सवारी और भगवान श्रीराम की यात्रा से जुड़ी है रावण दहन की परंपरा
रामलीला समिति के वरिष्ठ उपाध्यक्ष वीर सिंह भदौरिया ने बताया कि महाराज तेजसिंह जूदेव के सम्मान में विजयादशमी के अगले दिन रावण दहन की परंपरा आरंभ हुई थी। इसका लोग आज भी निर्वहन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले रामलीला का मंचन दिन में होता था लेकिन अब रात में किया जाता है। उन्होंने बताया कि प्रभु श्रीराम द्वारा रावण का अंत किया जाता है। इस दौरान उनके साथ पंजाबी समाज के हनुमान स्वरूप युवा भी रहते हैं।
अन्य स्थानों पर भी अलग-अलग दिन होता है रावण दहन
विजयादशमी को करहल में ही रावण दहन होता है। यह मंगलवार की देर शाम हो गया। जबकि बेवर में इस बार 31 अक्टूबर, भोगांव में दो नवंबर और कुरावली में 25 अक्टूबर के बाद बाद होगा।
महाराज तेजसिंह जूदेव की स्मृति को संजाेने के लिए क्षत्रिय समाज द्वारा दशहरा पर उनकी शोभायात्रा निकाली जाती है। इसके माध्यम से नई पीढ़ी को शहर के इतिहास और पुरानी परंपराओं से परिचित कराने का प्रयास किया जा रहा है। एकादशी को रावण दहन किया जाता है।
राजशाही के दौर में दशहरा पर तीन प्रमुख सवारियां निकाली जाती थीं। किले से महाराज तेजसिंह जूदेव की, रामलीला मैदान से भगवान के स्वरूपों की और गाड़ीवान मुहल्ला स्थित रामचंद्र भगवान की सवारी। बड़े चौराहा पर महाराजा भगवान स्वरूपों का पूजन करते थे। इसके बाद अगले दिन रावण दहन होता था।
