कानूनी पेंच में सियासी जमीन तलाश रहे पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी, दो टैग बनी बाधा
पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी ने फरेंदा सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा कर महराजगंज की सियासत गरमा दी है, लेकिन ...और पढ़ें

पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी की फाइल फोटो।
HighLights
पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी ने फरेंदा से चुनाव लड़ने का ऐलान किया।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव लड़ने पर रोक का पेंच।
राहुल अपहरण कांड में भगोड़ा घोषित होने से बढ़ी कानूनी मुश्किलें।
विश्वदीपक त्रिपाठी, महराजगंज। फरेंदा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी ने महराजगंज की सियासत में फिर हलचल बढ़ा दी है। मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में 19 साल बाद जेल से रिहाई के बाद वह खुद के साथ बेटे अमनमणि के लिए प्रचार में जुटे हैं। क्षेत्र में लगातार सक्रियता के बीच 10 सितंबर को गोरखपुर एयरपोर्ट पर कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव व यूपी के सह प्रभारी अभिषेक दत्त से उनकी मुलाकात ने सियासी चर्चाओं को हवा दे दी।
इधर, जनता असमंजस में है कि अमरमणि चुनाव कैसे लड़ेंगे? उनकी राह में सबसे बड़ा पेंच कानूनी है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(3) के तहत दो साल या उससे अधिक की सजा पाए व्यक्ति पर रिहाई के बाद छह वर्ष तक चुनाव लड़ने की रोक रहती है। अमरमणि की सजा 24 अगस्त 2023 को माफ हुई थी। ऐसे में 2029 तक की अयोग्यता का सवाल सामने है।
इससे राहत के लिए उन्हें उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय का रुख करना होगा। दूसरी ओर, बस्ती के राहुल अपहरण कांड में भगोड़ा घोषित होने से कानूनी मुश्किलें और बढ़ गई हैं। नौतनवा स्थित उनका आवास सील है और बस्ती कोतवाली पुलिस कागजों में उनकी तलाश कर रही है। छह सितंबर 2001 में जयपुरवा रोडवेज तिराहे से सुबह पौने आठ बजे धर्मराज मद्धेशिया के पुत्र राहुल का स्कूल जाते समय अपहरण कर लिया गया था। बाद में एसटीएफ ने उसे पूर्व मंत्री के आवास से बरामद कर लिया था।
इस मामले में सुनवाई की अगली तिथि 18 सितंबर तय की गई है। ऐसे में चुनावी मैदान में उतरने से पहले इस मामले में उन्हें न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ सकता है। स्व. मधुमिता शुक्ला की बहन निधि शुक्ला ने भी पूर्व मंत्री की कांग्रेस से बढ़ रही नजदीकी पर आपत्ति जताते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है। ऐसे में अमरमणि की सियासी तैयारी इलाके में पकड़ मजबूत करने के साथ कानूनी अड़चनों से रास्ता निकालने की चल रही है।
1989 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार बने थे विधायक
अमरमणि ने अपने सियासी सफर की शुरुआत 1989 में कांग्रेस से की थी। कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े अमरमणि ने 3257 मतों से जीत दर्ज की थी। 1991 व 1993 के चुनाव में उन्हें जनता पार्टी व सपा से चुनाव लड़े कुंवर अखिलेश सिंह ने पराजित कर दिया। 1996 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की।
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2002 का चुनाव बसपा के टिकट पर जीते। जबकि 2007 के चुनाव में सपा के टिकट पर विजय हासिल की। इस दौरान भाजपा, सपा व बसपा की विभिन्न सरकारों में मंत्री भी रहे। 9 मई 2003 को मधुमिता शुक्ला की हत्या के मामले में विशेष सीबीआइ अदालत ने 2007 में अमरमणि, मधुमणि सहित अन्य आरोपितों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(3) के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को दो साल या उससे अधिक की सजा हुई है,तो वह कारावास से मुक्त होने की तिथि से छह वर्षों तक चुनाव लड़ने लिए अयोग्य घोषित हो जाता है। धारा 475 बीएनएसएस सरकार को यह शक्ति देती है कि ऐसे सजायाफ्ता जो 14 वर्ष का कारावास पूर्ण कर चुके हों, उनकी सजा कम कर सकती है, लेकिन इसे किसी भी रूप में सजा से मुक्त या निर्दोष नहीं माना जा सकता है। ऐसे में चुनाव लड़ने के लिए जेल से बाहर निकलने की तिथि से छह वर्ष की अवधि आवश्यक होगी। इस छह वर्ष की अवधि में रियायत के लिए उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकते हैं।
