गोरखपुर-प्रयागराज में चुनावी रणनीति को धार देंगे तावड़े, पूर्वांचल की हारी हुई सीटों की होगी समीक्षा
उत्तर प्रदेश में भाजपा अपनी चुनावी रणनीति को धार देने में जुटी है, जिसके तहत प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े गोरखपुर और प्रयागराज का दौरा करेंगे।

यूपी बीजेपी प्रभारी विनोद तावड़े।

समय कम है?
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ। उत्तर प्रदेश के चुनावी कुरुक्षेत्र में राजनीतिक सेनाएं मोर्चा संभालने लगी हैं। समाजवादी पार्टी जहां पीडीए एवं प्रदेश सरकार के खिलाफ प्रभावी नैरेटिव गढ़कर चुनावी अस्त्र को धार देने में जुटी है।
वहीं भाजपा एक साथ तीन मोर्चों (अभियान, संगठनात्मक समीक्षा एवं छह क्षेत्रों में संघ के साथ समन्वय बैठकों) के सहारे चुनावी रथ हांक रही है।
वहीं, पार्टी पर सहयोगी दलों को अपने पाले में रखने का दबाव है। दो बार लखनऊ और एक बार कानपुर में मैराथन मंथन करने के बाद अब प्रदेश प्रभारी एवं राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े 17 और 18 सितंबर को गोरक्ष क्षेत्र में डेरा डालेंगे, वहीं 21 से 23 सितंबर तक प्रयागराज मथेंगे।
भाजपा की रणनीति के मुताबिक राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और विनोद तावड़े एक माह की कसरत में सभी प्रशासनिक मंडलों एवं पार्टी की दृष्टि से गठित क्लस्टरों की समीक्षा कर रिपोर्ट केंद्रीय नेतृत्व को दे देंगे। इन बैठकों में बूथों का राजनीतिक प्रबंधन भी परखा जाएगा।
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बूथों पर जुटाए गए राजनीतिक समीकरणों एवं प्रभावी जातियों की समीक्षा होगी। गोरखपुर एवं प्रयागराज क्षेत्र में होने वाली बैठकों का महत्व इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि यहां पर वर्ष 2022 एवं 2024 के चुनाव में भाजपा कई सीटों पर हारी या संघर्ष करती नजर आई।

पिछले चुनाव में बीजेपी को लगा था झटका
यहां का राजनीतिक गणित पहले सपा और बसपा के साथ रहा है, लेकिन 2014 से यह भाजपा के पाले में झुकता नजर आया। पिछले विधान सभा में भाजपा को झटका लगा। पार्टी नहीं संभली तो 2024 लोकसभा चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ा।
गोरक्ष एवं प्रयाग के आसपास की सीटों पर कुर्मी, निषाद, राजभर, मौर्य, केवट, मल्लाह, प्रजापति समेत आधा दर्जन ओबीसी जातियों की बड़ी संख्या है। कई सीटों पर सवर्णों में आपसी द्वंद भाजपा के लिए चिंता का सबब बन रहा है।
यूपी की राजनीति, बिहार से अलग
भले ही तावड़े बिहार का चुनावी तानाबाना समझकर प्रभाव छोड़ने में सफल रहे, लेकिन यूपी की राजनीतिक चाल कई मायनों में बिहार से अलग है। अगर वह बड़ी संख्या में टिकट बदलने के संकल्प के साथ यूपी आए हैं तो पहले यहां का वातावरण समझना होगा। संगठन एवं कार्यकर्ताओं में नया भरोसा जगाना होगा।
