सुरक्षित और मजबूत UPI के लिए क्यों जरूरी है शुल्क, जानें पूरा गणित
यूपीआई के बढ़ते उपयोग और डिजिटल भुगतान प्रणाली को मजबूत करने के लिए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) शुल्क आवश्यक है। ...और पढ़ें
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HighLights
आम ग्राहकों और छोटे दुकानदारों पर यूपीआई शुल्क का असर नहीं।
बड़े व्यापारियों पर ₹10,000 से अधिक भुगतान पर मामूली एमडीआर।
एमडीआर यूपीआई सिस्टम की मजबूती, सुरक्षा और विदेशी वर्चस्व रोकने हेतु।
पुलक त्रिपाठी, लखनऊ। यूपीआइ के इस्तेमाल को लेकर आम उपभोक्ताओं और छोटे दुकानदारों के बीच कुछ भ्रम देखा जा रहा है। कहीं दुकानदार कैश की मांग कर रहे हैं, तो कहीं मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) को लेकर अफवाहों का बाजार गर्म है। लेकिन हकीकत क्या है? क्या आम लोगों की जेब पर कोई असर पड़ेगा या यह कदम भारत के डिजिटल पेमेंट सिस्टम को सुरक्षा और मजबूती देने के लिए उठाया जा रहा है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं इस पूरे गणित और इसके पीछे के कारणों को। पुलक त्रिपाठी की रिपोर्ट...
देश के हर नागरिक तक पहुंच
भारत में डिजिटल क्रांति का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका यूपीआइ आज आम जिंदगी की जरूरत है। वित्त वर्ष 2025-26 में यूपीआइ के जरिये रोजाना औसतन 66 करोड़ से अधिक (पूरे वर्ष में लगभग 24,162 करोड़) लेनदेन दर्ज किए जा रहे हैं। आंकड़े गवाह हैं कि यूपीआइ की सेवा अब देश के 11 में से 11वें व्यक्ति तक सफलतापूर्वक पहुंच चुकी है। सब्जी के ठेले से लेकर बड़े शापिंग माल तक, यूपीआइ अब कोई विकल्प नहीं बल्कि दैनिक जीवन का एक अपरिहार्य हिस्सा बन चुका है।
आम ग्राहक को नहीं देने होंगे अतिरिक्त पैसे
आम नागरिकों के लिए दोस्तों, परिजन को पैसे भेजना, बिजली-पानी के बिल भरना या रोजमर्रा की खरीदारी पर यूपीआइ का उपयोग पहले की तरह पूरी तरह मुफ्त रहेगा। दुकानों या मर्चेंट्स पर ₹10 हजार तक के किसी भी भुगतान पर ग्राहकों से कोई अतिरिक्त चार्ज नहीं लिया जाएगा।
बड़े मर्चेंट्स पर मामूली शुल्क
10,000 से अधिक की बड़ी खरीदारी पर केवल बड़े व्यापारियों पर 0.4% या अधिकतम 300 का एमडीआर शुल्क प्रस्तावित है।
छोटे व्यापारी पूरी तरह सुरक्षित
गली-मोहल्ले के छोटे और ग्रामीण दुकानदारों को इस एमडीआर से पूरी तरह बाहर रखा गया है ताकि उनके कारोबार पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े।

टैक्स में राहत
दुकानदारों को इस प्रक्रिया में इनपुट टैक्स क्रेडिट का सीधा लाभ भी मिलेगा।
एमडीआर क्यों है बेहद जरूरी
कई लोगों के मन में सवाल है कि जब अब तक सब मुफ्त चल रहा था, तो शुल्क की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके पीछे तीन मुख्य तकनीकी और आर्थिक कारण हैं...
सिस्टम का रखरखाव और सर्वर मजबूती: लगातार बढ़ते करोड़ों ट्रांजैक्शन के बोझ को संभालने, "टेक्निकल फेलियर" को रोकने और सर्वर को चौबीस घंटे चालू रखने के लिए भारी इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है।
साइबर सुरक्षा का मजबूत कवच: आनलाइन फ्राड और हैकिंग को रोकने के लिए नेटवर्क की सुरक्षा पर सालाना लगभग 20,000 करोड़ का भारी-भरकम खर्च आता है।
कैश हैंडलिंग से सस्ता: देश में नोटों की छपाई, उनके परिवहन और नकद के रख-रखाव पर होने वाले भारी-भरकम खर्च की तुलना में डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश करना देश की अर्थव्यवस्था के लिए कहीं अधिक फायदेमंद है।
एमडीआर का बंटवारा
- 60 प्रतिशत हिस्सा एमडीआर शुल्क का बैंकों को जाएगा
- 25 प्रतिशत हिस्सा तकनीकी और यूजर इंटरफेस सुधारने के लिए पेमेंट ऐप्स को
- 25 प्रतिशत हिस्सा मर्चेंट-पेमेंट स्वीकार करने वाले सिस्टम/प्वाइंट्स को मिलेगा।
विदेशी एकाधिकार और वैश्विक दबाव से सुरक्षा
- यदि यूपीआइ सिस्टम से कोई राजस्व नहीं मिलेगा, तो बैंकों और एनपीसीआइ को नुकसान होगा और विदेशी ऐप्स का वर्चस्व बना रहेगा।
- वर्तमान में गूगल पे और फोनपे जैसी विदेशी या अमेरिकी स्वामित्व वाली ऐप्स का भारतीय पेमेंट मार्केट में 80% से अधिक कब्जा रहा है।
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यूपीआइ ने देश के पूरे क्रय विक्रय की प्रणाली को बदल दिया है। मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि बीते वित्तीय वर्ष में देश में यूपीआइ के माध्यम से करीब 25 हजार करोड़ ट्रांजेक्शन किए गए हैं।
-प्रो. अरविंद मोहन, अर्थशास्त्री, लवि।
एमडीआर को लेकर भ्रम दूर होना जरूरी है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य उपभोक्ताओं पर बोझ डालना नहीं, बल्कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था को मजबूत करना है।
- सुधीर गुप्ता, मुख्य महाप्रबंधक, इंडियन बैंक, लखनऊ।
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