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दल बदल की मचेगी होड़, पर आसान नहीं वोट बदलने की दौड़; अब इस पॉलिटिकल दांव में जोर आजमा रहीं भाजपा-सपा

Published: Fri, 16 Oct 2026 05:36 AM (IST)

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले दल-बदल की राजनीति तेज हो गई है, जिसमें सपा और भाजपा दोनों विरोधी ...और पढ़ें

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HighLights

  1. विधानसभा चुनाव से पहले दल-बदल की राजनीति तेज हुई।

  2. सपा के तीन विधायक भाजपा में, पूर्व सांसद सपा में शामिल।

  3. नेताओं का दल बदलना, मतदाताओं का मिजाज बदलना नहीं।

राज्य ब्यूरो, जागरण, लखनऊ। विधान सभा चुनाव की आहट के साथ दल बदल की राजनीति शुरू हो कई है। पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप की सपा में जाने की तैयारी और सपा के तीन विधायकों का भाजपा में शामिल होना, बदलते समीकरणों की दो अलग-अलग तस्वीरें हैं।

एक ओर दल, अपने पाले में प्रभावशाली नेताओं को लाने में जुटे हैं, तो दूसरी ओर असली चुनौती उनके साथ समर्थकों और मतदाताओं को जोड़ने की है, क्योंकि केवल बड़े चेहरों को साथ लाने भर से ही मतदाताओं का मिजाज नहीं बदलता।

पूर्व में दल-बदल के ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां बड़े-बड़े चेहरे भी पाला बदलने के बाद जीत हासिल नहीं कर पाए। ऐसे में दलों को नये चेहरों के साथ संगठन की एकजुटता और मतदाताओं के समीकरणों को भी जोड़ना होगा।

वर्ष 2024 में राज्यसभा के चुनाव में क्रास वोटिंग करने वाले सपा विधायक राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी बुधवार को भाजपा में शामिल हो गए। दूसरी तरफ भाजपा के पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप आंवला से 2014 और 2019 में सांसद रहे। वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव वह सपा के नीरज मौर्य से हार गए थे। हाल में राज्यसभा की उम्मीदवारी नहीं मिलने के बाद उन्होंने सपा प्रमुख अखिलेश यादव से मुलाकात की और सपा में शामिल होने के कयास हैं।

दल-बदल की बढ़ेग गति

गुरुवार को भी कुछ पूर्व विधायकों कई नेता सपा में शामिल हुए। वहीं क्रास वोटिंग करने वाले सपा के विधायक मनोज कुमार पांडेय, पूजा पाल सहित अन्य चेहरे भी भाजपा के साथ पहले से खड़े हैं। साफ है कि भाजपा और सपा दोनों, विरोधी खेमे के असंतुष्ट नेताओं पर नजर रखे हुए हैं और आने वाले दिनों में दल-बदल की गति बढ़ेगी।

सपा की रणनीति, पिछड़े वर्ग के नेताओं को जोड़कर पीडीए समीकरण को मजबूत करने के साथ यह माहौल बनाने की है कि हार सुनिश्चित देख भाजपा नेता, सपा में आ रहे हैं। दूसरी तरफ भाजपा भी इसी तरह का नैरेटिव खड़ा करने के साथ क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को मजबूत कर रही है।

हालांकि, किसी विधायक या नेता का दल-बदलना, इस बात की गारंटी नहीं कि उसके क्षेत्र के मतदाता भी उसी राजनीतिक दिशा में जाएंगे। वर्ष 2022 के विधान सभा चुनाव से पहले भाजपा छोड़कर सपा में आए स्वामी प्रसाद मौर्य और धर्म सिंह सैनी जैसे नेताओं को हार का सामना करना पड़ा था, जबकि दारा सिंह चौहान घोसी से जीत गए थे। वर्ष 2023 में दारा सिंह ने सपा और विधायकी से इस्तीफा देकर भाजपा ज्वाइन की तो वह उपचुनाव हार गए थे।

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दूसरी तरफ नए चेहरे के आने से पुराने कार्यकर्ताओं की दावेदारी प्रभावित होने से असंतोष उभरने का खतरा है। सपा और भाजपा, दोनों को जाने-आने वाले चेहरों से संबंधित क्षेत्र-समीकरणों में अपने संगठन के लिहाज से संतुलन बनाने की चुनौती है।