लखनऊ में तारों के जाल में कैद हो गया गांव का खेत खलिहान, हर खेत की बनी अपनी अलग सरहद
नीलगायों और बेसहारा पशुओं से फसल बचाने के लिए किसानों को अपने खेतों को तारों से घेरना पड़ रहा है, ...और पढ़ें
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यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है।
HighLights
नीलगाय और बेसहारा पशु फसलें नष्ट कर रहे हैं।
किसान खेतों के चारों ओर तार लगा रहे हैं।
इससे खेती की लागत और मेहनत बढ़ गई है।
विमल सिंह चौहान, निगोहां। कभी गांव की पहचान दूर-दूर तक फैले खुले खेतों, खलिहानों और खेतों की मेड़ों से हुआ करती थी। गांव के बाहर निकलते ही लहलहाती फसलें और दूर तक दिखाई देने वाले खेत ग्रामीण परिवेश की खूबसूरती में चार चांद लगाते थे। खेतों के बीच न कोई दीवार थी और न ही तारों की कोई सरहद। लेकिन वक्त के साथ गांव की यह तस्वीर अब बदल गई है।
दूर से ही दिखाई देने वाले खेतों की हरियाली से पहले चारों तरफ खिंचे तारों के बाड़े नजर आते हैं। फसल बचाने की मजबूरी ने गांव के खुले खेतों को तारों की कैद में पहुंचा दिया है। नीलगायों और बेसहारा पशुओं का बढ़ता आतंक किसानों के लिए मुसीबत बन गया है। दिन-रात मेहनत करके बोई गई फसल को पशुओं के झुंड कुछ ही घंटों में चौपट कर देते हैं। खेतों में घुसने वाले पशुओं से फसल बचाने के लिए किसानों को रातभर जागकर पहरा देना पड़ता है।
इसके बावजूद मेहनत की कमाई को बर्बाद होने से बचाना आसान नहीं रह गया है। आखिरकार किसानों ने खेतों के चारों ओर लोहे के तारों की बाड़ लगाकर फसलों की सुरक्षा का इंतजाम करना शुरू कर दिया है। अब गांवों में खेतों की मेड़ पर तारों के घेरे आम नजारा बन गए हैं। छोटे-बड़े खेतों को तारों से घेरने में किसानों को अतिरिक्त रकम खर्च करनी पड़ रही है।
खेती की बढ़ती लागत, खाद-बीज और सिंचाई के खर्च के बीच खेतों की सुरक्षा का नया बोझ भी किसानों की जेब पर भारी पड़ रहा है। किसान शिव कुमार, भारत, बद्री प्रसाद, मनोहर आदि ने बताया कि, उनकी फसल सुरक्षित रहे, लेकिन पशुओं की समस्या ने उन्हें खेती के साथ सुरक्षा का भी इंतजाम करने पर मजबूर कर दिया है। इसका असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों की पारंपरिक तस्वीर भी बदल रही है।
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