जौनपुर की इमरती से लेकर लखनऊ की मक्खन मलाई तक, अब विदेशों में भी ले सकेंगे पारंपरिक और स्थानीय व्यंजन का स्वाद
उत्तर प्रदेश सरकार एक जिला एक व्यंजन योजना के तहत पारंपरिक खाद्य उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने के लिए कारोबारियों को प्रोत्साहित कर रही है।

इस फोटो को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।
HighLights
पारंपरिक व्यंजनों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना लक्ष्य।
पैकेजिंग, गुणवत्ता सुधार पर 50 लाख तक की सब्सिडी।
मेलों में भागीदारी पर 75% खर्च वापसी का प्रावधान।
महेन्द्र पाण्डेय, लखनऊ। अगर डोसा पैक होकर जा सकता है तो इमरती क्यों नहीं? एक जिला एक व्यंजन योजना में चयनित ऐसे अनेक उत्पादों को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने के लिए सरकार खाद्य कारोबारियों और हलवाइयों को प्रोत्साहित कर रही है।
संयुक्त आयुक्त उद्योग सुनील कुमार ने गुरुवार को अपने प्रेजेंटेशन में बताया कि एक जिला एक व्यंजन (ओडीओसी) योजना के तहत खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग, गुणवत्ता सुधार, आधुनिक मशीनरी, कोल्ड चेन और प्रमाणन के लिए 50 लाख रुपये तक की सब्सिडी दी जा रही है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मेलों में शामिल होने और विभिन्न गुणवत्ता प्रमाणपत्र हासिल करने पर खर्च का 75 प्रतिशत तक वापस किया जाएगा। इससे छोटे खाद्य कारोबारियों को अपने उत्पादों की ब्रांडिंग और कारोबार विस्तार का अवसर मिलेगा।
दैनिक जागरण और सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यम विभाग के संयुक्त तत्वावधान में इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित टेस्ट आफ उत्तर प्रदेश कार्यक्रम में संयुक्त आयुक्त उद्योग ने बताया कि प्रदेश के पारंपरिक व्यंजनों में वैश्विक बाजार की बड़ी संभावनाएं हैं। जरूरत केवल उनकी बेहतर पैकेजिंग, गुणवत्ता और ब्रांडिंग की है।
उन्होंने कहा कि जौनपुर की इमरती, लखनऊ की मक्खन मलाई और दूसरे स्थानीय व्यंजनों की अलग-अलग और आकर्षक पैकेजिंग की जाए तो इन्हें भी दूसरे राज्यों और देशों तक पहुंचाया जा सकता है। इससे उत्पादों का मूल्य संवर्धन होगा और कारोबारियों की आमदनी बढ़ेगी।
सुनील कुमार ने बताया कि योजना के तहत खाद्य प्रसंस्करण की मशीनें, पैकेजिंग मशीन, शेल्फ लाइफ बढ़ाने के उपकरण, गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था और कोल्ड चेन स्थापित करने के लिए आर्थिक सहायता दी जा रही है। क्लाउड किचन और प्रसंस्करण इकाइयां लगाने वाले कारोबारी भी इसके दायरे में हैं।
मेलों में भागीदारी पर भी सहायता
सुनील कुमार ने बताया कि कारोबारियों को बाजार उपलब्ध कराने के लिए देश-विदेश के व्यापारिक मेलों और प्रदर्शनियों में भाग लेने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। मेले में स्टाल, उत्पादों के परिवहन और यात्रा पर हुए खर्च का 75 प्रतिशत तक सरकार वापस करती है। इससे छोटे उद्यमियों को बड़े खरीदारों और वितरकों से सीधे जुड़ने का मौका मिलता है।
उन्होंने सिद्धार्थनगर के काला नमक चावल का उदाहरण देते हुए बताया कि रचनात्मक ब्रांडिंग और बाजार से जुड़ाव के कारण यह उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचा है। स्थानीय बाजार में करीब 100 रुपये किलो बिकने वाला काला नमक चावल अरब देशों में 2,500 रुपये किलो तक बिक रहा है।
इसके उत्पादों की ई-कामर्स साइटों के माध्यम से भी विदेश में बिक्री हो रही है। इसी तरह लिट्टी-चोखा के एक कारोबारी को अंतरराष्ट्रीय हॉस्पिटैलिटी एक्सपो में करीब सात करोड़ रुपये के फ्रेंचाइजी कारोबार का अवसर मिला।
75 जिलों में पैकेजिंग का प्रशिक्षण
संयुक्त आयुक्त ने बताया कि भारतीय पैकेजिंग संस्थान, केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (सीएफटीआरआइ), फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथारिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई), होटल प्रबंधन संस्थानों और अन्य तकनीकी संस्थाओं के सहयोग से खाद्य कारोबारियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
अभी तक करीब 19 जिलों में हलवाइयों और खाद्य विक्रेताओं को पैकेजिंग संबंधी प्रशिक्षण व तकनीकी सहयोग दिया जा चुका है। नवंबर-दिसंबर तक सभी 75 जिलों को इससे जोड़ने का लक्ष्य है। इसके अलावा खाद्य प्रसंस्करण, कृषि, उद्यान और पर्यटन विभाग के सहयोग से स्थानीय व्यंजनों के विक्रेताओं को प्रशिक्षण तथा बाजार उपलब्ध कराने की पहल की जा रही है।
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