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संभल के स्वाद और हुनर का जलवा, 31 साल पुरानी 'रॉयल स्वीट्स' की सोनपापड़ी और हस्तशिल्प ने जीता दिल

Published: Fri, 06 Nov 2026 09:46 AM (IST)

संभल की पहचान उसकी पारंपरिक सोनपापड़ी और हस्तशिल्प से बनी है, जिसे रॉयल स्वीट्स और कारीगर शाह आलम पीढ़ियों से सहेज रहे हैं।

ये तस्वीर AI द्वारा जनरेट की गई।

ये तस्वीर AI द्वारा जनरेट की गई।

HighLights

  1. रॉयल स्वीट्स 1995 से संभल की पारंपरिक सोनपापड़ी बना रहा है।

  2. शाह आलम 25 वर्षों से हस्तशिल्प कला को आगे बढ़ा रहे हैं।

  3. ओडीओपी के माध्यम से लखनऊ में उत्पादों को मिला प्रदर्शन का अवसर।

प्रशांत भारती/आशुतोष पांडेय, लखनऊ। किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों और इतिहास से नहीं, बल्कि वहां के पारंपरिक स्वाद और पीढ़ियों से चले आ रहे हुनर से भी बनती है। संभल की सोनपापड़ी और हस्तशिल्प इसी विरासत की मिसाल हैं।

एक ओर जहां रायल स्वीट्स करीब तीन दशक से सोनपापड़ी के पारंपरिक स्वाद को बरकरार रखने में जुटा है, वहीं दूसरी ओर कारीगर शाह आलम अपने परिवार के साथ हस्तशिल्प कला को आगे बढ़ा रहे हैं।

दैनिक जागरण और एक जनपद, एक उत्पाद (ओडीओपी) के माध्यम से दोनों को लखनऊ में अपने उत्पादों को प्रदर्शित करने का अवसर मिला।

संभल स्थित रायल स्वीट्स में वर्ष 1995 से सोनपापड़ी बनाने की शुरुआत हुई थी। दुकान से जुड़े हमजा के मुताबिक, उनके पिता ने इस कारोबार की नींव रखी। परिवार 31 साल से यही काम संभाल रहा है। यहां मुख्य रूप से सोनपापड़ी तैयार की जाती है।

हमजा बताते हैं कि उत्पाद की गुणवत्ता और सामग्री की शुद्धता को प्राथमिकता दी जाती है। उनका कहना है कि बाजार में कीमतों का अंतर हो सकता है, लेकिन वे स्वाद और गुणवत्ता से समझौता नहीं करते। परिवार की कोशिश है कि पारंपरिक मिठाई का वही स्वाद आगे भी बरकरार रहे, जिसने इसे संभल की पहचान दिलाई है।

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वहीं, संभल के कारीगर शाह आलम पिछले 25 वर्षों से हस्तशिल्प के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उन्होंने यह हुनर अपने पिता और अनुभवी उस्तादों से सीखा है। परिवार के सहयोग से वे ज्वेलरी, नेकलेस, ईयररिंग, हेयर क्लिप, बैंगल्स के साथ टी-कोस्टर, फोटो फ्रेम, ज्वेलरी बाक्स, चापिंग बोर्ड और मग जैसे उत्पाद तैयार करते हैं।

उनके लिए यह केवल कारोबार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से मिले हुनर को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है। दोनों के प्रयास में एक समानता है। वे अपनी पारंपरिक पहचान को समय के साथ आगे बढ़ाना चाह रहे हैं। ओडीओपी के मंच के जरिए इन स्थानीय उत्पादों को नए बाजार और ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर मिल रहा है।

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