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हुनर का कमाल: जूट और ऊन से सजावटी कलाकृतियां गढ़ रोशन कुमार ने 60 महिलाओं को दी आत्मनिर्भरता की राह

Published: Wed, 04 Nov 2026 11:13 PM (IST)

गाजीपुर के रोशन कुमार जूट और ऊन से आकर्षक कलाकृतियां बनाते हैं, जिनकी प्रदर्शनी लखनऊ में लगी है। उनके इस ...और पढ़ें

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

HighLights

  1. रोशन कुमार जूट और ऊन से आकर्षक कलाकृतियां बनाते हैं।

  2. उत्पादों की प्रदर्शनी इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान, लखनऊ में लगी है।

  3. 60 स्थानीय कारीगरों, खासकर महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त किया।

जागरण संवाददाता, लखनऊ। हुनर अगर हुनरमंद हाथों को मिल जाए तो न केवल साधारण चीजें कलाकृति का रूप ले लेती हैं, बल्कि रोजगार के नए रास्ते भी खुलते हैं। गाजीपुर जिले के सैदपुर भितरी गांव के रोशन कुमार ने जूट और ऊन को अपनी रचनात्मकता का माध्यम बनाकर कुछ ऐसी ही मिसाल पेश की है।

उनके हाथों से तैयार होने वाली आकर्षक सीनरी और सजावटी वस्तुएं घरों की खूबसूरती बढ़ाने के साथ ही कई परिवारों की जिंदगी में खुशहाली के रंग भी भर रही हैं। रोशन ने दैनिक जागरण और सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यम विभाग के संयुक्त तत्वावधान में इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित प्रदर्शनी में अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाई है।

रोशन कुमार जूट और ऊन जैसी प्राकृतिक सामग्री से ऐसी कलाकृतियां तैयार करते हैं, जिनमें हुनर, कल्पनाशीलता और बारीक कारीगरी का सुंदर मेल दिखाई देता है। वह सीनरी में अलग-अलग डिजाइन और आकार के माध्यम से प्रकृति के दृश्य उकेरते हैं। इसके अलावा घरों की सजावट के लिए कई तरह के उत्पाद और जूट से बनी छोटी-छोटी आकर्षक वस्तुएं भी तैयार करते हैं।

खुद तक सीमित नहीं रखी हुनर की चमक

जूट की चिड़िया जैसी कलाकृतियां महज 100 रुपये में उपलब्ध हैं, जबकि सीनरी की कीमत डिजाइन और आकार के अनुसार 350 से 2350 रुपये तक है। रोशन के अनुसार एक सामान्य सीनरी को तैयार करने और उसकी फिनिशिंग में कारीगर को लगभग एक दिन का समय लगता है। इस हुनर की सबसे खास बात यह है कि रोशन कुमार ने इसे खुद तक सीमित नहीं रखा।

ओडीओपी (एक जिला, एक उत्पाद) के तहत संचालित इस कार्य से उन्होंने स्थानीय स्तर पर करीब 60 लोगों को जोड़ा है। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है, जो घर की जिम्मेदारियां निभाने के साथ इस काम के जरिये आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। उन्हें काम के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ती और वे अपनी सुविधानुसार हुनर का इस्तेमाल कर आमदनी अर्जित कर रही हैं।

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इस काम से जुड़े कारीगर औसतन हर महीने 10 से 12 हजार रुपये तक कमा लेते हैं। रोशन कहते हैं कि रोजगार के लिए हमेशा बड़े संसाधनों या कारखानों की जरूरत नहीं होती। स्थानीय हुनर, उपलब्ध कच्चे माल और थोड़ी रचनात्मक सोच से भी आर्थिक बदलाव की राह तैयार की जा सकती है।

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