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PGI के डॉक्टरों ने किया चमत्कार: रोबोटिक सर्जरी से बना दिया नया मूत्राशय, 20 साल की अर्पिता को मिली नई जिंदगी

Published: Fri, 18 Sep 2026 06:33 PM (IST)

प्रो. संजय सुरेका ने संजय गांधी पीजीआइ में रोबोटिक सर्जरी से एक दुर्लभ बीमारी से पीड़ित 20 वर्षीय अर्पिता के ...और पढ़ें

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

HighLights

  1. प्रो. संजय सुरेका ने रोबोटिक सर्जरी से नया मूत्राशय बनाया।

  2. 20 वर्षीय अर्पिता को दुर्लभ बीमारी से नया जीवन मिला।

  3. यूरोजेनिटल टीबी के कारण थिम्बल ब्लैडर का सफल इलाज हुआ।

कुमार संजय, लखनऊ। संजय गांधी पीजीआइ के यूरोलाजी विभाग के प्रो. संजय सुरेका ने रेयर डिजीज से ग्रसित युवती को रोबोटिक सर्जरी की मदद से बड़ी आंत से नया मूत्राशय बनाकर उसे नई जिंदगी दी। बिहार के बेगूसराय की रहने वाली 20 वर्षीय अर्पिता पिछले छह साल से गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं, जिसमें पेशाब लगातार रिसता था।

शरीर से बदबू, हर वक्त कपड़े गीले और समाज से दूरी का डर सताता था। एसजीपीजीआइ में दिखाया तो जांच में ट्यूबरक्यूलर वेसिकोवेजाइनल फिस्टुला विद थिम्बल ब्लैडर निकला। यूरोजेनिटल ट्यूबरकुलोसिस मूत्र और जननांग की टीबी की एक बहुत ही जटिल और गंभीर स्थिति है। वीवीएफ में पेशाब की थैली और वेजाइना का रास्ता आपस में जुड़ जाता है, जो मरीज की मुश्किलें बढ़ा देता है।

क्या है यह बीमारी?

आमतौर पर यह समस्या 30 से 40 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में बच्चेदानी निकालने या सिजेरियन आपरेशन के दौरान चूक से होती है, लेकिन अर्पिता को हुई बीमारी दुनिया में सबसे रेयर मानी जा रही है। उसे टीबी के कारण वीवीएफ के साथ थिम्बल ब्लैडर हो गया, यानी थैली सिकुड़ कर छोटी हो गई।

ऐसे केस गिने-चुने ही दर्ज हैं। प्रो. संजय सुरेका के अनुसार, पीजीआइ में मेरे 15 साल के करियर में यह पहला मामला है। इस रोग का सबसे बड़ा खतरा यह है कि समय पर इलाज न हो तो पेशाब किडनी में वापस वापस जाने से किडनी फेल हो सकती है।

छह साल, चार अस्पताल और पीजीआइ ने दिया जीवनदान

पिता किशोर सिन्हा ने बताया कि 2020 में बेटी को यूटीआई हुआ। उसके बाद पेशाब का फ्लो कम हो गया और बार -बार पेशाब करने जाना पड़ता था। बिहार में दो जगह दिखाया, फिर दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल गए, जहां कैथेटर डालकर निकाल दिया गया कहा गया कि ठीक हो जाएगा, लेकिन आराम नहीं मिला। इसके बाद पटना में आइजीआइएमएस में दिखाया, पर कोई फायदा नहीं हुआ।

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इस तरह छह वर्ष में चार अस्पतालों चक्कर काटने के बाद रिश्तेदारों की सलाह पर 2024 में परिवारजन मरीज को लेकर एसजीपीजीआइ की यूरोलाजी ओपीडी में पहुंचे। प्रो. संजय सुरेखा ने लक्षण के आधार पर टीबी की जांच कराई तो बीमारी की पुष्टि हुई। किडनी की टीबी का असर ब्लैडर तक पहुंच चुका था।

एडवांस रोबोटिक सर्जरी से बनाई नई थैली

प्रो. संजय सुरेका के अनुसार, पहले छह महीने टीबी की दवा देकर इंफेक्शन खत्म किया गया। अप्रैल में रोबोटिक सर्जरी कर जुड़े हुए हिस्से को अलग किया गया और सिकुड़ी हुई थैली को आंत से टुकड़ा लेकर नया मूत्राशय बनाया गया। यूरोलाजी के विभागाध्यक्ष प्रो. एमएस अंसारी ने कहा कि यदि लगातार लीकेज की समस्या है और कोई कारण नहीं मिल रहा तो टीबी की जांच जरूर करानी चाहिए।

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फॉलो अप के लिए ओपीडी में आई अर्पिता के चेहरे पर मुस्कान थी। बोली, अब मैं अपनी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर पाऊंगी। निदेशक प्रो. आरके धीमान ने उपचार करने वाली टीम को बधाई दी।