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यूपी में जमीन फाड़कर निकाला जाएगा पानी का खजाना: कानपुर से प्रयागराज के बीच मिली 200 KM लंबी प्राचीन नदी

Published: Wed, 16 Sep 2026 09:41 PM (IST)

कानपुर से प्रयागराज के बीच 200 किलोमीटर लंबा प्राचीन नदी मार्ग (पैलियो चैनल) खोजा गया है, जो जमीन से 25 ...और पढ़ें

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

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HighLights

  1. कानपुर-प्रयागराज के बीच 200 किमी लंबा प्राचीन नदी मार्ग मिला।

  2. वर्षा जल को भूजल भंडार में पुनर्भरण के लिए उपयोग होगा।

  3. नमामि गंगे और भूगर्भ जल विभाग मिलकर परियोजना चलाएंगे।

राज्य ब्यूरो, लखनऊ। कानपुर से प्रयागराज के बीच करीब 200 किलोमीटर लंबे पुराने नदी मार्ग (पैलियो चैनल) की पहचान हुई है। यह मार्ग जमीन की सतह से करीब 25 मीटर नीचे है। अब इसका उपयोग वर्षा जल के भूजल भंडार में पुनर्भरण के लिए किया जाएगा। साथ ही यह अध्ययन भी किया जा रहा है कि यह पैलियो चैनल कितना पुराना है।

भूगर्भ जल विभाग राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (नमामि गंगे) के सहयोग से इस परियोजना को आगे बढ़ाएगा। राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआइ) तकनीकी सहयोग देगा। परियोजना तीन वर्ष में पूरी की जाएगी।

भूगर्भ जल विभाग के निदेशक डा. राजेश कुमार प्रजापति के अनुसार, परियोजना के लिए पहला सर्वे 2022 में कराया गया था। अब इसके आधार पर आगे की कार्रवाई शुरू की गई है। एनजीआरआइ के वैज्ञानिकों ने भूभौतिकीय सर्वे और बोरहोल जांच के माध्यम से इस पुराने नदी मार्ग की पहचान की है।

पुराने नदी मार्गों की स्थिति को समझने में मिली मदद

कई स्थानों पर इसकी चौड़ाई चार से पांच किलोमीटर तक होने की संभावना है। इस क्षेत्र में रेत और कंकड़ की परतें अधिक होने के कारण पानी के जमीन में आसानी से पहुंचने और उसके संचयन की संभावना है। डा. प्रजापति के अनुसार, अध्ययन से गंगा-यमुना दोआब के नीचे मौजूद जलभंडार और पुराने नदी मार्गों की स्थिति को समझने में मदद मिली है।

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इसी आधार पर भूजल पुनर्भरण के लिए उपयुक्त स्थानों का चयन किया जा रहा है। पहले चरण में कानपुर, फतेहपुर और कौशांबी के छह स्थानों पर काम शुरू हो चुका है। परियोजना के अध्ययन में 150 से अधिक संभावित स्थान चिह्नित किए गए हैं। पायलट प्रोजेक्ट के परिणामों के आधार पर इसके विस्तार का निर्णय लिया जाएगा।

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प्रजापति ने बताया कि परियोजना का उद्देश्य वर्षा जल को बहकर नष्ट होने से रोकना और उसका भूजल भंडार में पुनर्भरण करना है। परियोजना में वैज्ञानिक निगरानी के साथ जल संरक्षण को लेकर जनजागरूकता के कार्य भी शामिल हैं।

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