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लखनऊ के पारंपरिक स्वाद: रसाजे और बुकनू से लेकर कश्मीरी चाय तक, जब महक उठीं जायके की यादें

By Anand TripathiEdited By: Shiv Govind Mishraa
Published: Thu, 05 Nov 2026 10:34 PM (IST)

लखनऊ में 'एक जिला, एक व्यंजन' प्रदर्शनी में पारंपरिक पकवानों पर चर्चा हुई, जिसमें मालिनी अवस्थी और हिमांशु बाजपेयी ने अवधी जायके की यादें साझा कीं।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

HighLights

  1. मालिनी अवस्थी और हिमांशु बाजपेयी ने अवधी जायके पर चर्चा की।

  2. पारंपरिक पकवानों जैसे रसाजे, बुकनू, मीठे करेले का जिक्र हुआ।

  3. लखनऊ की पाक परंपराओं को सहेजने का संकल्प लिया गया।

आनंद त्रिपाठी, लखनऊ। आतिथ्य के लिए विख्यात लखनऊ में जब जायके की बात चली तो शब्दों में चटपटापन घुलने लगा। पारंपरिक पकवानों की सुगंध ने यादों के झरोखे ऐसे खोले कि रसाजे, करायल, खरिका और शगपैथा से होते हुए बात मीठे करेले और बुकनू तक जा पहुंची।

मांसाहारी पकवानों से शुरू हुआ सफर राजा की ठंडई और फालसे के शर्बत से होता हुआ शुक्ला जी की चाट तक पहुंच गया। फिर भला मक्खन मलाई और कश्मीरी चाय कैसे पीछे रह जातीं। स्वाद की संगत में सिर्फ तारीफों के पुल ही नहीं बंधे, बल्कि कुछ शिकायतों के तीर भी चले। खाने का बेड़ा गर्क करने का ठीकरा पनीर के सिर फोड़ा गया तो पानी के बताशे में प्याज डालने पर नाराजगी भी दिखी।

दैनिक जागरण की ओर से इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित दो दिवसीय 'एक जिला, एक व्यंजन' (ओडीओसी) प्रदर्शनी के दूसरे दिन गुरुवार को खानपान पर शुरू हुई चर्चा पाक परंपरा को सहेजने के संकल्प तक पहुंची। प्रथम सत्र 'अवध के जायके' में लोकगायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी और किस्सागो हिमांशु बाजपेयी ने अपने अनुभवों और स्मृतियों के जरिये लखनऊ के पारंपरिक स्वाद की परतें खोलीं। बातचीत को दैनिक जागरण के राज्य संपादक (उप्र) आशुतोष शुक्ल ने आगे बढ़ाया।

मालिनी अवस्थी ने कहा कि वह शाकाहारी हैं, लेकिन मांसाहारी व्यंजनों की भी अच्छी जानकारी रखती हैं। परिवार में कई लोग मांसाहार करते थे, इसलिए उन्हें इसे करीब से जानने का अवसर मिला।

पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि उनकी मां शाकाहारी कबाब बनाती थीं, जिन्हें खाकर कोई पहचान नहीं पाता था कि वे मांसाहारी नहीं हैं। सर्दियों के व्यंजनों का जिक्र करते हुए उन्होंने शगपैथा और चावल के मेल को याद किया। कहा कि दादी-नानियों ने साग खिलाने के लिए कितने दिलचस्प पकवान विकसित किए थे। रसाजे और सूतफेनी का स्वाद आज भी याद आता है।

लखनऊ के गुड़ वाले मीठे करेले की तो बात ही अलग है। हिमांशु बाजपेयी ने कहा कि मांसाहारी व्यंजनों की चर्चा अधिक होने के कारण शाकाहारी पकवानों को वह पहचान नहीं मिल पाई, जिसके वे हकदार हैं। पनीर ने पारंपरिक व्यंजनों की जगह ले ली है। अब हर समारोह में पनीर ही नजर आता है। उन्होंने सुझाव दिया कि घरों में बनने वाले पारंपरिक पकवानों के लिए भी रेस्तरां होने चाहिए, जहां करायल, रसाजे और मिजनी जैसे व्यंजन मिल सकें।

ठंडई से टिक्की तक लखनऊ के स्वाद की कहानी

मालिनी अवस्थी ने लखनऊ के स्ट्रीट फूड से जुड़ी यादें साझा करते हुए बताया कि पिता के साथ शहर आने पर कुछ जगहों पर जाना तय रहता था। पिता को राजा की ठंडई पसंद थी तो मां को अमीनाबाद के मटर और टिक्की। गणेशगंज में तिवारी की चाट, रामआसरे के खस्ते और मटके वाली कुल्फी का स्वाद भी उन्हें खूब भाता था। आज भी शुक्लाजी की चाट और अकबरी गेट की कश्मीरी चाय आकर्षित करती है।

उन्होंने कहा कि लखनऊ को खास बनाने वाली बात यहां ग्राहक और दुकानदार के बीच का आत्मीय रिश्ता है। एक बार दुकानदार पहचान ले तो ग्राहक को कभी नहीं भूलता। हिमांशु बाजपेयी ने कहा कि खानपान में भी लखनऊ की अपनी तहजीब है।

आज लोग पानी के बताशों में प्याज और चाट में अनार के दाने डलवाकर खाते हैं, जबकि पुराने लखनऊ में ऐसा मांगने पर दुकानदार खाने वाले को अनाड़ी समझते हैं। फालसे का शर्बत, आम का पन्ना और ठंडई यहां के खास पारंपरिक पेय हैं।

दाल बनाने वाले खानसामा को मिलते थे 500 रुपये

हिमांशु बाजपेयी ने अवध के खानपान से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा सुनाया। उन्होंने बताया कि अरहर की दाल को दाल-ए-सुल्तानी भी कहा जाता है। लखनऊ के नवाब इसे बड़े चाव से खाते थे। नवाब आसिफुद्दौला अपने एक खानसामा को उस दौर में केवल दाल बनाने के लिए 500 रुपये देते थे।

अपने खानपान पर करें अभिमान

मालिनी अवस्थी ने कहा कि आधुनिक जीवनशैली और कामकाजी महिलाओं की व्यस्तता के बीच पारंपरिक व्यंजनों को जीवित रखना जरूरी है। अपने हाथों से प्रेमपूर्वक खाना बनाकर अपनों को परोसने का आनंद अलग है।

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पकवानों में स्वाद के साथ प्रेम भी होना चाहिए। वहीं, हिमांशु बाजपेयी ने सुझाव दिया कि घर के बुजुर्गों की खास रेसिपी को वीडियो के माध्यम से सुरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उन व्यंजनों के स्वाद और उनसे जुड़े संस्कारों से परिचित हो सकें।

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