जेवर-गंगा एक्सप्रेसवे लिंक परियोजना में एलएंडटी को राहत नहीं, हाई कोर्ट का बोली खारिज करने का फैसला बरकरार
Allahabad High Court Lucknow Bench: कोर्ट ने माना कि तकनीकी मूल्यांकन समिति ने निविदा की शर्तों के अनुरूप निर्णय लिया और उसका फैसला मनमाना या अतार्किक नहीं था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ
HighLights
एलएंडटी की बोली जमा करने की अंतिम तिथि थी सात सितंबर 2026
कंपनी को उत्तर प्रदेश जल जीवन मिशन ने किया है प्रतिबंधित
विधि संवाददाता, लखनऊ: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने जेवर एयरपोर्ट-गंगा एक्सप्रेसवे लिंक परियोजना में लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) की तकनीकी बोली खारिज करने के फैसले को सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि इसकी बोली जमा करने की अंतिम तिथि पर कंपनी सरकारी प्रतिबंध के दायरे में थी, इसलिए वह निविदा में भाग लेने के लिए पात्र नहीं थी।
न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की पीठ ने उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीडा) के 25 सितंबर के उस निर्णय को चुनौती देने वाली एलएंडटी की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उसकी बोली को गैर-उत्तरदायी घोषित किया गया था।
कोर्ट ने कहा कि निविदा की शर्तों के अनुसार केंद्र या राज्य सरकार अथवा उनके नियंत्रण वाले किसी निकाय द्वारा किसी संस्था को परियोजनाओं में भाग लेने से प्रतिबंधित किया गया हो और बोली की अंतिम तिथि पर वह प्रतिबंध लागू हो, तो ऐसी संस्था बोली लगाने के लिए पात्र नहीं होगी।
कोर्ट के सामने आया कि एलएंडटी की बोली जमा करने की अंतिम तिथि सात सितंबर 2026 थी। कंपनी को 13 अप्रैल 2026 को उत्तर प्रदेश जल जीवन मिशन ने प्रतिबंधित किया था। सात सितंबर को यह प्रतिबंध प्रभावी था। इसे 14 सितंबर को यानी बोली की अंतिम तिथि के सात दिन बाद स्थगित किया गया।
अपने फैसले में पीठ ने एलएंडटी की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि बाद में प्रतिबंध स्थगित किए जाने के आदेश से उसकी अयोग्यता भी पूर्व प्रभाव से समाप्त हो गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रतिबंध को स्थगित करने वाला आदेश आगे की अवधि में प्रभावी होता है और उससे पहले लागू रहे प्रतिबंध को समाप्त नहीं करता।
कोर्ट ने कंपनी की उस दलील को भी खारिज कर दिया कि गंभीर संरचनात्मक या राजमार्ग संबंधी विफलता नहीं होने संबंधी उसकी घोषणा से निविदा की शर्त पूरी हो गई थी। कोर्ट ने कहा कि दोनों शर्तों का उद्देश्य अलग था। एक तकनीकी क्षमता से संबंधित थी, जबकि दूसरी बोली लगाने की मूल पात्रता की शर्त थी।
एलएंडटी ने यह भी कहा था कि उसकी बोली को खारिज करने से उसे भारी वित्तीय नुकसान हुआ है। कंपनी के अनुसार उसकी कीमत सबसे कम बोली लगाने वाले से करीब 252 करोड़ रुपये कम थी। कोर्ट ने कहा कि कम कीमत की पेशकश करने से किसी अपात्र बोलीदाता को अपनी वित्तीय बोली पर विचार कराने का अधिकार नहीं मिल जाता।
पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि एलएंडटी ने उत्तर प्रदेश में लगे प्रतिबंध की जानकारी यूपीडा को मूल्यांकन प्रक्रिया के दौरान स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद दी थी। हालांकि, कोर्ट ने माना कि बोली खारिज करने से पहले कंपनी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया था।
कोर्ट ने माना कि तकनीकी मूल्यांकन समिति ने निविदा की शर्तों के अनुरूप निर्णय लिया और उसका फैसला मनमाना या अतार्किक नहीं था। हालांकि, याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस फैसले से एलएंडटी को सक्षम मंच के समक्ष अपने खिलाफ लगाए गए प्रतिबंध के आदेशों को चुनौती देने के उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने से नहीं रोका जाएगा।
