इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, बैंक खाते को धोखाधड़ी घोषित करने से पहले देना होगा पूरा ब्योरा
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एसबीआई के धोखाधड़ी नोटिस को रद्द किया और सहकारी बैंकों द्वारा मूल कर्ज से दोगुनी वसूली पर अंतरिम रोक लगाई।

बैंक खाते को धोखाधड़ी वाला घोषित करने से पहले देना होगा पूरा विवरण।
HighLights
एसबीआई धोखाधड़ी नोटिस रद्द, बैंक को देना होगा पूरा विवरण।
सहकारी बैंकों की दोगुनी कर्ज वसूली पर हाई कोर्ट की अंतरिम रोक।
लखनऊ में कूड़ा डंपिंग की जांच के लिए न्यायिक आयुक्त नियुक्त।
विधि संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने बैंक खाते को धोखाधड़ी वाला घोषित करने के मामले में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस और धोखाधड़ी वर्गीकरण के आदेश को रद कर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि किसी खाताधारक को धोखाधड़ी वाला घोषित करना गंभीर और दंडात्मक परिणाम वाला कदम है। इसलिए बैंक को आरोपों और उनके आधार का पूरा विवरण उपलब्ध कराना जरूरी है। यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने पारमार ट्रैवेल्स एंड ट्रांसपोर्ट की याचिका पर दिया।
याचियों का आरोप था कि उन्हें जारी कारण बताओ नोटिस में धोखाधड़ी के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने वाले लेन-देन और घटनाओं का पर्याप्त विवरण नहीं दिया गया था। वहीं, बैंक की ओर से कहा गया कि 4.90 करोड़ रुपये के टर्म लोन से 10 ट्रकों की खरीद प्रस्तावित थी, लेकिन याचियों ने नौ ट्रक ही खरीदे। एक ट्रक के बीमा दस्तावेज में भी विसंगति सामने आई थी।
कोर्ट ने कहा कि बैंक को विस्तृत कारण बताओ नोटिस, संबंधित सामग्री और जहां प्रासंगिक हो पूरी फारेंसिक आडिट रिपोर्ट उपलब्ध करानी होगी। खाताधारक को लिखित जवाब का उचित अवसर देने के बाद कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा। व्यक्तिगत या मौखिक सुनवाई हर मामले में अनिवार्य नहीं है।
कोर्ट ने पाया कि मौजूदा नोटिस और आदेश में धोखाधड़ी तथा धन के कथित दुरुपयोग के पर्याप्त विशिष्ट कारण नहीं बताए गए थे। इसलिए दोनों को रद कर दिया गया। हालांकि, एसबीआई को कानून के अनुसार नए सिरे से विस्तृत कारण बताओ नोटिस जारी करने की स्वतंत्रता दी गई है।
मूल कर्ज से दोगुनी राशि वसूली संबंधी रोक वाले आदेश पर अंतरिम रोक
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है जिसमें सहकारी बैंकों को मूल कर्ज से दोगुनी राशि से अधिक वसूली से रोक दिया गया था। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने 22 जुलाई को यह आदेश दिया था। यह अंतरिम रोक मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक लिमिटेड की विशेष अपील पर लगाई है।
एकलपीठ ने महोबा के बैजनाथ व 15 अन्य की याचिकाएं निस्तारित करते हुए कुछ गंभीर मुद्दों पर स्वत: संज्ञान लिया था और व्यापक जांच के लिए कमेटी गठित करने का निर्देश दिया था। यह भी निर्देश दिया था कि कमेटी की कार्यवाही पूरी होने तक किसी भी कर्जदार से मूल कर्ज से दोगुनी राशि से अधिक वसूली न की जाए और किस्तों में भुगतान के अनुरोध पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाए।
बैंक ने इस आदेश को विशेष अपील में चुनौती देते हुए कहा कि कर्जदार कोर्ट में केवल किस्तों में भुगतान की मांग लेकर आया था, लेकिन एकलपीठ ने याचिका के दायरे से बाहर जाकर पूरे प्रदेश के लिए ऐसी रोक लगा दी, जो कानून के विपरीत है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों यथा वीके मजोत्रा बनाम यूनियन आफ इंडिया (2003) सोम मित्तल बनाम कर्नाटक सरकार, एम पुरंदरा व अन्य बनाम महादेशा का हवाला दिया।
बैंक के अनुसार दामदुपट नियम ( इसमें ब्याज की रकम मूलधन से ज्यादा नहीं हो सकती, चाहे समय कितना भी हो) पर हाई कोर्ट की खंडपीठ साहब सिंह बनाम कलेक्टर हरदोई मामले में पहले ही विचार कर चुकी है।
खंडपीठ ने कहा कि कोर्ट द्वारा स्वत: संज्ञान लेकर कमेटी गठित करने में प्रथमदृष्टया कुछ गलत नहीं लगता, क्योंकि विभाग ने खुद इस वर्ष 16 मई को कमेटी बनाई थी और एडिशनल एडवोकेट जनरल की मदद से सुनवाई हुई थी, लेकिन जब तक कानून मौजूद है, कर्ज अनुबंध और लागू कानूनों के तहत वसूली पर रोक नहीं लगाई जा सकती। मामले में विचार की आवश्यकता बताते हुए खंडपीठ ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है।
यह है पृष्ठभूमि
बैजनाथ ने दो भैंस खरीदने के लिए 50 हजार रुपये का लोन लिया था। बैंक ने 13 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर लोन स्वीकृत किया। पांच नवंबर 2009 को अनुबंध हुआ और छह नवंबर 2009 व 15 फरवरी 2010 को 25-25 हजार की दो किस्तों में राशि जारी हुई। भुगतान पांच साल में होना था। सुरक्षा के तौर पर 0.882 हेक्टेयर जमीन गिरवी रखी गई।
याची ने केवल तीन हजार रुपये (बैंक के नए विवरण में 2500 रुपये) लौटाए। बैंक ने 2018 से 2022 तक ओटीएस योजना के लाभ के लिए नोटिस भी दिया था। कर्ज न चुकाने पर राशि बढ़कर 10 मार्च 2026 को याचिका दायर करने तक 3,49,862 रुपये हो गई।
सड़क और आवासीय इलाकों के पास कूड़ा डंपिंग की हाई कोर्ट कराएगा जांच
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने जानकीपुरम स्थित छुइया पुरवा, पुरानी घनी बस्ती के पास मुख्य सड़क, फुटपाथ और आवासीय क्षेत्र के आसपास ठोस कचरा डाले जाने के आरोपों पर मौके की जांच कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने अधिवक्ता अभिषेक वर्मा को न्यायिक आयुक्त नियुक्त करते हुए आठ अक्टूबर तक जांच रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
यह आदेश न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की पीठ ने सुनील कुमार गुप्ता व 13 अन्य की ओर से उनके अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री की ओर से दाखिल एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया है।
सुनवाई के दौरान पाया कि याची की ओर से किए गए कचरा डंपिंग के दावे को राज्य सरकार ने विवादित बताया। इस पर दोनों पक्षों के दावों की वास्तविकता सामने लाने के लिए कोर्ट ने मौके का निरीक्षण आवश्यक माना।
कोर्ट ने न्यायिक आयुक्त नियुक्त करते हुए निर्देश दिया कि वह विवादित स्थल पर जाकर पता लगाएं कि क्या मुख्य सड़क, फुटपाथ तथा आसपास के आवासीय इलाकों के पास ठोस कचरा डाला जा रहा है।
न्यायिक आयुक्त को अपनी रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर कोर्ट में दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। पीठ ने याची और नगर निगम के अधिकारियों को न्यायिक आयुक्त के साथ समन्वय कर जांच में सहयोग करने को कहा है।
टैंकर में कौन सा खतरनाक पदार्थ था, बीमा कंपनी को करना होगा साबित: हाई कोर्ट
बीमा कंपनी केवल इस आधार पर मुआवजा देने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकती कि दुर्घटना के समय टैंकर में स्पिरिट भरी थी और चालक के पास खतरनाक पदार्थों के परिवहन के लिए विशेष अनुमोदन नहीं था।
बीमा कंपनी को यह साबित करना होगा कि टैंकर में ले जाया जा रहा संबंधित पदार्थ केंद्रीय मोटर वाहन नियमावली, 1989 के तहत निर्धारित खतरनाक पदार्थों की श्रेणी में आता था। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए दिया है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने कहा कि केवल इस तथ्य से कि टैंकर में स्पिरिट ले जाई जा रही थी, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसमें नियमों के तहत खतरनाक पदार्थ का परिवहन किया जा रहा था। अदालत ने कहा कि अभिलेख पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह स्थापित हो सके कि टैंकर में ले जाया जा रहा विशिष्ट पदार्थ नियमावली में निर्धारित खतरनाक पदार्थों की किसी श्रेणी में आता था।
मामला मार्च 2015 में सड़क दुर्घटना में महेंद्र कुमार की मृत्यु से जुड़ा था। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, सुलतानपुर ने मृतक के विधिक वारिसों को 19.04 लाख रुपये क्षतिपूर्ति और सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया था। इसी आदेश के खिलाफ बीमा कंपनी ने हाई कोर्ट में अपील दाखिल की थी।
बीमा कंपनी का कहना था कि टैंकर चालक के पास भारी मालवाहक वाहन चलाने का वैध लाइसेंस तो था, लेकिन खतरनाक अथवा जोखिमपूर्ण पदार्थों के परिवहन के लिए आवश्यक अतिरिक्त अनुमोदन नहीं था। बीमा कंपनी ने इसे इथेनाल के समान बताया। कंपनी के अनुसार इथेनाल नियमावली में खतरनाक पदार्थों की सूची में शामिल है, इसलिए चालक के पास विशेष अनुमोदन नहीं होना बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन था।
हालांकि, हाई कोर्ट ने संबंधित नियमों की जांच के बाद कहा कि नियमावली की तालिका-III में स्पिरिट या इथेनाल की प्रत्येक किस्म को खतरनाक पदार्थ के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है। इसलिए केवल टैंकर में स्पिरिट ले जाए जाने की बात से यह साबित नहीं होता कि उसमें नियमों के तहत खतरनाक पदार्थ का परिवहन किया जा रहा था।
