लखीमपुर में इंसानियत की मिसाल, रुचि पाल की सोच और समाजसेवियों के सहयोग से मिट रही सैकड़ों गरीबों की भूख
लखीमपुर खीरी में रुचि पाल द्वारा शुरू की गई अन्नपूर्णा रसोई तीन साल से मात्र दस रुपये में जरूरतमंदों को ...और पढ़ें
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HighLights
रुचि पाल ने दस रुपये की अन्नपूर्णा रसोई शुरू की।
प्रतिदिन 150-200 लोगों को भरपेट भोजन मिलता है।
रसोई को रोज 2500-3000 रुपये का घाटा होता है।
राकेश मिश्र, लखीमपुर खीरी। किसी के लिए दस रुपये मामूली रकम हो सकती है, लेकिन जरूरतमंद के लिए यही रकम भूख मिटाने का सहारा बन सकती है। रिक्शा चालकों को दस और 20 रुपये के समोसे खाकर भूख मिटाते देखकर उठे एक सवाल ने अन्नपूर्णा रसोई की नींव रखी। 15 जून 2023 को शुरू हुई यह पहल तीन साल से जरूरतमंदों को भरपेट भोजन उपलब्ध करा रही है।
यहां रोज 150 से 200 लोग दस रुपये देकर भोजन करते हैं। हालांकि, भोजन करने वालों से मिलने वाली राशि से रसोई का खर्च पूरा नहीं होता। प्रतिदिन चार से पांच हजार रुपये खर्च होते हैं, जबकि 1500 से 2000 रुपये ही एकत्र हो पाते हैं। ऐसे में रोज 2500 से तीन हजार रुपये की अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ती है।
रिक्शा चालक की पीड़ा बनी प्रेरणा
अन्नपूर्णा रसोई की शुरुआत सिकटिया की 25 वर्षीय रुचि पाल की पहल से हुई। रिक्शा चालकों को समोसे खाते देखकर उन्होंने एक चालक से इसकी वजह पूछी। बातचीत में पता चला कि महंगाई के कारण भरपेट भोजन खरीदना मुश्किल हो जाता है।
रोज कमाने और खाने वाले लोगों की यह पीड़ा रुचि को भीतर तक छू गई। उन्होंने अपनी बात मधुलिका त्रिपाठी के सामने रखी। इसके बाद शहर के करीब 40 समाजसेवियों से संपर्क किया गया और सामूहिक सहयोग से रसोई शुरू हुई।
चार महिलाओं के श्रम से तैयार होता है भोजन
अन्नपूर्णा रसोई के लिए मधुलिका त्रिपाठी के यहां भोजन तैयार किया जाता है। इसकी व्यवस्था और प्रबंधन की जिम्मेदारी हरि प्रकाश त्रिपाठी संभाल रहे हैं। भोजन बनाने सहित अन्य कार्यों में चार महिलाएं जुटी रहती हैं। इन महिलाओं के खर्च को भी रसोई के दैनिक बजट में शामिल किया जाता है।
प्रतिदिन चार से पांच हजार रुपये का खर्च आता है, जबकि दस रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से 150 से 200 लोगों से केवल 1500 से 2000 रुपये ही मिलते हैं। शेष राशि के लिए रोज 2500 से तीन हजार रुपये की व्यवस्था करनी पड़ती है। करीब 40 समाजसेवियों का सहयोग इस सेवा को लगातार आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
मेहनतकशों और तीमारदारों को राहत
रसोई का लाभ मुख्य रूप से रिक्शा चालकों, आटो चालकों, अस्पतालों में भर्ती मरीजों के तीमारदारों और दूरदराज के गांवों से शहर आने वाले लोगों को मिलता है। इनके लिए कम खर्च में भरपेट भोजन मिलना बड़ी राहत है।
विश्व खाद्य दिवस पर अन्नपूर्णा रसोई की कहानी बताती है कि भूख के खिलाफ लड़ाई केवल बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि संवेदनशील सोच, सामूहिक सहयोग और निरंतर प्रयास से भी लड़ी जा सकती है। दस रुपये की यह थाली जरूरतमंदों को भोजन के साथ सम्मान और सहारा भी देती है।
