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UP के इस जिले में रावण वध विजयदशमी नहीं एकादशी को किया जाता है, 247 साल से चली आ रही अनूठी परंपरा 

By Adarsh Kumar Srivastava Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Fri, 16 Oct 2026 04:37 PM (IST)

कौशांबी के दारानगर में विजयदशमी के बजाय एकादशी को रावण वध होता है। श्रीराम और रावण की सेनाओं के बीच ...और पढ़ें

कौशांबी के दारानगर का ऐतिहासिक कुप्पी युद्ध, जिसमें श्रीराम-रावण की सेना लड़ती है। जागरण आर्काइव

कौशांबी के दारानगर का ऐतिहासिक कुप्पी युद्ध, जिसमें श्रीराम-रावण की सेना लड़ती है। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. विजयदशमी और एकादशी के दिन श्रीराम-रावण की सेना के बीच होता है सजीव कुप्पी युद्ध

  2. कौशांबी के दारानगर की अनूठी है रामलीला, कुप्पी युद्ध देखने के लिए दूर-दूर से आते हैं लोग

जागरण संवाददाता, कौशांबी। देशभर में विजयदशमी पर रावण के पुतले का दहन होता है। वहीं ऐतिहासिक दारानगर की रामलीला में परंपरा कुछ अलग है। यहां विजयदशमी पर नहीं, एकादशी को भगवान श्रीराम के हाथों रावण का वध होता है। करीब 247 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में धार्मिक मान्यताओं के साथ सजीव कुप्पी युद्ध भी खास आकर्षण का केंद्र रहता है।

विजयदशमी और एकादशी के दिन श्रीराम और रावण की सेनाओं के बीच कुप्पी युद्ध का सजीव मंचन किया जाता है। दशमी को युद्ध के चार चरण होते हैं, जबकि एकादशी को तीन चरणों में निर्णायक संग्राम होता है। अंतिम चरण में भगवान श्रीराम के हाथों रावण का वध किया जाता है। इस अनूठे आयोजन को देखने के लिए जिले के अलावा आसपास के जनपदों से भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं।

रामलीला कमेटी के प्रभारी प्रभाकर शुक्ला ने बताया कि मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने दशमी को रावण को पराजित किया था, जबकि उसके प्राण एकादशी को निकले थे। इसी मान्यता के आधार पर यहां एकादशी को रावण वध की परंपरा निभाई जाती है।

शिवभक्त और प्रकांड विद्वान था रावण

आचार्य पंडित शिवा अभिलाष शुक्ल के अनुसार, रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त और वेदों का प्रकांड विद्वान था। हालांकि, अहंकार और अधर्म के कारण उसका अंत हुआ। रामलीला का यह प्रसंग संदेश देता है कि ज्ञान और शक्ति के बावजूद धर्म व मर्यादा का पालन आवश्यक है। दारानगर की रामलीला धार्मिक आयोजन के साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है।

युद्ध मैदान की मिट्टी का लगाते हैं मलहम

कुप्पी युद्ध में इस्तेमाल होने वाली कुप्पी पहले चमड़े से बनाई जाती थी। कानपुर के कारीगर ही कुप्पी का निर्माण करते थे। अब प्लास्टिक की कुप्पियों का इस्तेमाल होने लगा है। युद्ध के दौरान कुप्पी लगने से कई बार योद्धा चोटिल भी हो जाते हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार, घायल योद्धा मैदान की मिट्टी को ही घाव पर लगाते हैं और इसे मलहम के रूप में प्रयोग करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी दारानगर की रामलीला को विशिष्ट पहचान देती है।

स्थानीय लोग निभाते हैं किरदार

दारानगर में होने वाली रामलीला की खासियत है कि किरदार की भूमिका स्थानीय लोग ही निभाते हैं। क्षेत्र के दारानगर, म्योहरा, थुलगुला, शादीपुर कमंगलपुर, गढ़ी आदि गांवों में अलग-अलग रामलीला प्रसंगों का मंचन किया जाता है। यहां दशहरा पर्व नहीं, बल्कि महोत्सव की तरह मनाया जाता है। क्षेत्रीय गांव में रहने वाले लोगों के यहां खासकर दशमी व एकादशी के दिन रिश्तेदारों की खासी भीड़ पहुंचती है।

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