कानपुर, जेएनएन। सात बार विधायक रहे भगवती सिंह विशारद आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी यादें मौजूदा परिवेश में नेताओं के लिए मिसाल बन गई हैं। सादगी उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रही। गांव के गलियारों से पैदल चलकर हमेशा रोडवेज बस से विधानसभा पहुंचे और राजनीति में नया इतिहास रचा। यही कारण रहा लोगों ने उन्हें उन्नाव के गांधी की उपाधि से हमेशा नवाजा।

बस से करते थे सफर

भगवती सिंह विशारद सबसे पहले 1957 में विधायक बने। इसके बाद सात बार भगवंतनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे, लेकिन कभी कार से नहीं चले। वह गांव से पैदल बारा बस स्टाप तक आते थे और रोडवेज बस से ही उन्नाव, कानपुर घर या विधानसभा लखनऊ जाते थे। बस में विधायक की सीट पर बैठना उनका अधिकार था, लेकिन भगवती सिंह विशारद ने कभी ऐसा नहीं किया। उन्होंने दूसरे विधायकों को भी यहीं समझाया था।

उनके जैसा अब कोई नहीं सोचता

कांग्र्रेस के पूर्व विधायक नेकचंद्र पांडेय कहते हैं, सदन में मैं विशारद जी के बगल में ही बैठता था, उनसे बहुत कुछ सीखा। वह कहते थे कि बस में अगर सफर कर रहे हो और कोई यात्री विधायक के लिए आरक्षित सीट पर बैठा है तो उसे हटाओ नहीं। जब वह बस से उतर जाए तो उस सीट पर बैठो। ऐसा कोई कहां सोचता है। उनके मुताबिक यह उनके परिवार के लिए सौभाग्य की बात है कि पिता जी शिव राम पांडेय उनके साथ 1957 में विधायक रहे और वह 1985 में उनके साथ विधायक थे।

पेड़ा खिलाकर पानी जरूर पिलाते थे

पूर्व विधायक भूधर नारायण मिश्रा को आज भी विशारद जी का सानिध्य याद है। उनके अनुसार 1980 और 1985 में सदन में उनका साथ मिला। उनके घर जाते थे तो वह पेड़ा खिलाकर पानी जरूर पिलाते थे। उन्होंने पूरा जीवन सादगी से जिया। लोग उन्हें कितना पसंद करते थे, इसका उदाहरण उनकी सात बार की जीत है। युग दधीच देहदान अभियान के संयोजक मनोज सेंगर ने बताया कि विशारद जी ने 17 जनवरी 2010 को मेडिकल कालेज पहुंच देहदान का संकल्प लिया था।

राजनीतिक सफर

1952 में प्रजातांत्रिक सोशलिस्ट पार्टी से पहला चुनाव कानपुर से लड़े और हार गए। दूसरा चुनाव इसी दल से 1957 में भगवंतनगर क्षेत्र से लड़ा और जीत दर्ज कराई। 1962 में पुन: इसी दल से चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। 1967 के चुनाव में पुन: जीत दर्ज कराई। इसके बाद कांग्रेस से 1969 और 1974 में विधायक बने। 1977 में जनता पार्टी की लहर में चुनाव हार गए। 1980 और 1985 के चुनाव में पुन: जीत हासिल कर ली। साल 1989 में भाजपा लहर में वह देवकी नंदन ने चुनाव हार गए। 1991 में अपने आखिरी चुनाव में भाजपा के चौधरी देवकीनंदन को हराकर सातवीं बार विधायक बने।

हर दल में था सम्मान

गांधीवादी नेता के रूप में विख्यात भगवती सिंह विशारद का हर दल में सम्मान था। कांग्रेस ही नहीं, सपा नेता पूर्व मंत्री स्व. अनवार अहमद, पूर्व सांसद देवीबक्स सिंह, संघ कार्यकर्ता कुंवर वीरपाल सिंह आदि दिग्गज भी विशारद जी का सम्मान करते थे। जन समस्या को लेकर जिस किसी ने उनसे संघर्ष में सहयोग मांगा, उसकी मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।

स्वतंत्रता सेनानियों को देते थे फिरंगियों की सूचना

स्वर्गीय भगवती सिंह विशारद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि पिता कानपुर के धनकुट्टी में रमेश तिवारी के मकान में रहते थे। गांव में पांचवीं तक की शिक्षा लेने के बाद कानपुर में पिता के पास रहने लगा। पिता अंग्रेज अफसर के घर में मजदूरी किया करते थे। 1932 में उनकी उम्र करीब 12 वर्ष की थी। अंग्रेज ने पिता से बूट पॉलिश के लिए कहा पर उन्होंने इन्कार कर दिया। इस पर उन्हें पेड़ से बंधवा कर पिटाई गई थी। उसी दिन से क्रांतिकारियों से जुड़ गया और अंग्रेज पुलिस की हर एक गतिविधि की जानकारी उनको पहुंचाने लगे।

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Posted By: Abhishek

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