Kanpur में 160 करोड़ की सरकारी जमीन में बड़ा घोटाला, 60 फर्जी मालिक बनाए, बाबूओं को Gift में प्लॉट
कानपुर के मकसूदाबाद में 160 करोड़ की सरकारी जमीन पर फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। 110 बीघा ऊसर भूमि को ...और पढ़ें
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HighLights
सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से दस्तावेजों में चढ़ाए गए नाम
जिलाधिकारी ने एसडीएम से कर्मचारियों की रिपोर्ट मांगी
सदर तहसील के मकसूदाबाद का है मामला
जागरण संवाददाता, कानपुर। सदर तहसील के मकसूदाबाद में सरकारी जमीन को निजी बनाने की सुनियोजित साजिश आखिरकार बेनकाब हो गई है। मकसूदाबाद में करीब 110 बीघा ऊसर और बंजर भूमि को फर्जी बैनामों के जरिए निजी दिखाने का खेल लंबे समय से चल रहा था। करीब 160 करोड़ रुपये मूल्य की इस भूमि पर 60 से अधिक लोग खुद को मालिक बताने लगे थे।
एसडीएम सदर की कोर्ट ने सभी फर्जी दावों को खारिज कर जमीन को पुनः सरकारी खाते में दर्ज करने के आदेश दिए हैं। इस आदेश के साथ ही कलक्ट्रेट और तहसीलों में बाबुओं की सुनियोजित गठजोड़ का भी राजफाश हो गया है। इस मामले में जिलाधिकारी ने सभी बाबुओं की रिपोर्ट एसडीएम से मांगी है।
न्यायालय की जांच में साफ हुआ कि जिन दस्तावेजों के आधार पर जमीन को निजी बताया जा रहा था, वे न केवल अवैध थे बल्कि कूटरचित भी थे। खसरा, खतौनी और नामांतरण रजिस्टरों में यह तथ्य सामने आया कि जिन पट्टों का हवाला दिया गया, वे कभी विधिवत दर्ज ही नहीं थे। बाद में सरकारी रिकार्ड में की गई हेराफेरी के जरिए सरकारी भूमि को हड़पने का प्रयास किया गया।
सदर तहसील की कोर्ट ने इसे संगठित साजिश मानते हुए सभी कथित मालिकों को बेदखल कर दिया। इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस बंदरबांट में राजस्व विभाग के भीतर बैठे बाबुओं और कर्मचारियों ने मिलकर खेल किया है। जांच के दौरान एसडीएम और एडीएम कोर्ट में तैनात स्टेनों व बाबुओं द्वारा अपने परिजनों के नाम पर जमीन दर्ज कराए जाने के प्रमाण मिले हैं।
एक सेवानिवृत्त जनरल क्लर्क द्वारा बेटे के नाम पर करोड़ों रुपये की जमीन खरीदे जाने का मामला भी उजागर हुआ है। वहीं महिला बाबुओं ने अपने रिश्तेदारों के नाम पर जमीनें दर्ज कराईं हैं। सालों से एक ही कुर्सी पर कई पटल का कार्य देखने वाले बाबुओं ने सरकारी भूमि पर बंदरबांट का खेल खूब किया है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने तत्काल संज्ञान लेते हुए एसडीएम सदर से विस्तृत जांच रिपोर्ट तलब की है। डीएम ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मकसूदाबाद में जमीन खरीदने वाले सभी कार्यरत और सेवानिवृत्त कर्मचारियों की सूची तैयार की जाए। साथ ही यह भी जांच की जाए कि किस-किस ने भूमि या आवास खरीदने से पहले अनिवार्य अनुमति ली थी और किन लोगों ने नियमों को ताक पर रखकर जमीन खरीद के सौदे किए।
प्रशासनिक नियमों के मुताबिक किसी भी सरकारी कर्मचारी को भूमि या आवास खरीदने से पहले जिलाधिकारी से अनुमति लेना अनिवार्य होता है। इसके बावजूद, इस प्रकरण में आरोप है कि 160 करोड़ रुपये की सरकारी भूमि में बंदरबांट के लिए बाबुओं को ‘गिफ्ट’ के तौर पर प्लाट सौंपे गए। रिकार्ड में हेराफेरी कर ऊसर-बंजर भूमि को निजी बताने की कोशिश की गई।
यह मामला सिर्फ जमीन कब्जाने का नहीं, बल्कि सिस्टम में गहरे बैठे भ्रष्टाचार का आईना है। जब न्यायालय ने दस्तावेजों की सच्चाई उजागर की, तो यह साफ हो गया कि बिना अंदरूनी मिलीभगत के इतनी बड़ी हेराफेरी संभव नहीं थी। अब सवाल यह है कि क्या जांच सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगी या दोषियों पर सख्त कार्रवाई भी होगी।
मकसूदाबाद में सरकारी भूमि खरीदने वाले बाबुओं और कर्मचारियों की रिपोर्ट एसडीएम सदर से मांगी गई हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
जितेन्द्र प्रताप सिंह,जिलाधिकारी
