पहले पन्ने पर शुभ-लाभ, फिर शुरू होता है कारोबार; डिजिटल दौर में भी कानपुर के व्यापारी नहीं भूले बही-खाते की परंपरा
डिजिटल युग में भी कानपुर के व्यापारी दिवाली पर पारंपरिक बही-खाता पूजन की परंपरा कायम रखे हुए हैं। यह नए ...और पढ़ें

देवी एंड कंपनी में बही पूजन करते व्यवसायी : जागरण
HighLights
डिजिटल दौर में भी बही-खाता पूजन का महत्व बरकरार।
दिवाली पर नए कारोबारी वर्ष की शुभ शुरुआत का प्रतीक।
पहले पन्ने पर 'शुभ-लाभ' लिखकर की जाती है पूजा।
जागरण संवाददाता, कानपुर। कारोबार भले ही अब कंप्यूटर और डिजिटल साफ्टवेयर पर सिमट गया हो, लेकिन दीपावली पर नए बही-खाते की पूजा की परंपरा आज भी व्यापारियों के बीच कायम है। व्यापारी इसे केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नए कारोबारी वर्ष की शुभ शुरुआत का प्रतीक मानते हैं।
रविवार को कानपुर कपड़ा कमेटी के कार्यालय में बही-खाता पूजन हुआ। कपड़ा बाजार में यह परंपरा आज भी बरकरार है और गुजरात व महाराष्ट्र से आए व्यापारियों के प्रतिष्ठानों में इसका विशेष आयोजन होता है। रविवार को दोपहर तीन बजे के बाद बही - खाता पूजन किया गया।
गुजरात में इसे ''''चोपड़ा पूजन'''' कहा जाता है। इसे कारोबार के पुराने वर्ष की विदाई और नए कारोबार का शुभारंभ माना जाता है। इस पूजा को समृद्धि और कारोबार में वृद्धि की कामना के साथ किया जाता है। गुजरात से आए व्यापारी परिवार की फर्म देवी एंड कंपनी के गौरव अग्रवाल के के अनुसार, पुराने समय में दीपावली को ही व्यापारियों का नया साल माना जाता था।
उस दौर में सालभर का हिसाब-किताब दीपावली पर पूरा किया जाता था। पुराने बही-खाते बंद कर नए खाते खोले जाते थे। गुजरात में दीपावली के अगले दिन को नववर्ष मनाया जाता है। आज भी गुजरात में कई व्यापारिक प्रतिष्ठान दीपावली के बाद लाभ पंचमी पर शुभ मुहूर्त में खुलते हैं।
कानपुर कपड़ा कमेटी में रविवार को श्रीगणेश लक्ष्मी के साथ बही खाता पूजन भी किया गया। इसमें प्रधान सचिव दीपक कुमार गुप्ता, कोषाध्यक्ष अशोक माहेश्वरी, विश्वनाथ गुप्ता विस्सू बाबू , श्रीकृष्ण गुप्ता , अमित दोसर, अशोक कुमार माहेश्वरी , अभिषेक चावला मौजूद समेत अन्य कारोबारी शामिल हुए।
अमित दोसर ने बताया कि आधुनिक समय में कारोबार का हिसाब-किताब भले ही कंप्यूटर, अकाउंटिंग साफ्टवेयर और आनलाइन माध्यमों से रखा जा रहा हो, लेकिन पूजन के लिए व्यापारी आज भी पारंपरिक बही-खाते खरीदते हैं। कई प्रतिष्ठानों में प्रतीकात्मक रूप से एक बही रखी जाती है।
व्यापारियों का मानना है कि कंप्यूटर पर कामकाज करने के बावजूद कागजी बही का धार्मिक और पारंपरिक महत्व अलग है। भगवान को साक्षी मानकर पूजा किए बिना नई रोकड़ और लेन-देन की शुरुआत नहीं की जाती। बाजार के कारोबारी ज्योति प्रकाश नेवटिया ने बताया कि कुछ कारोबारी हालांकि धनतेरस को ही बही - खाता का पूजन कर चुके हैं लेकिन कपड़ा बाजार में दीपावली पर पूजन की परंपरा बनी हुई है।
पहले पन्ने पर लिखते हैं शुभ-लाभ
बही-खाता पूजन में रोली, अक्षत, फूल और पान के पत्ते से पूजा की जाती है। भगवान गणेश, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती का स्मरण कर कारोबार में सुख-समृद्धि और बुद्धि-विवेक की कामना की जाती है। बही -खाते के पहले पन्ने पर स्वास्तिक बनाकर ''''श्री'''', ''''शुभ'''' और ''''लाभ'''' लिखने की विशेष परंपरा है। इसके बाद भगवान के सामने ही नई बही में पहली प्रविष्टि की जाती है।
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