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AI Revolution: चार साल में AI की बड़ी छलांग, अब सदियों पुरानी पहेलियां होंगी आसान

Published: Sat, 12 Sep 2026 02:17 PM (IST)

एआई ने पिछले चार वर्षों में शिक्षा, चिकित्सा और वैज्ञानिक शोध सहित कई क्षेत्रों में तेजी से प्रगति की है, ...और पढ़ें

आईआईटी के डायरेक्टर प्रो. मणिन्द्र अग्रवाल। इंटरनेट मीडिया

आईआईटी के डायरेक्टर प्रो. मणिन्द्र अग्रवाल। इंटरनेट मीडिया

HighLights

  1. एआई ने चार वर्षों में शिक्षा, चिकित्सा, कृषि में व्यापक बदलाव लाए

  2. चैटजीपीटी के आने से जटिल वैज्ञानिक समस्याओं का समाधान आसान हुआ

  3. एआई के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग पर ध्यान देना आवश्यक है

जागरण संवाददाता, कानपुर। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने बीते चार वर्षों में ऐसी तेज छलांग लगाई है, जिसने तकनीक की दुनिया के साथ शिक्षा, चिकित्सा, कृषि और वैज्ञानिक शोध की दिशा भी बदल दी है। वर्ष 2021 में पाठ से तस्वीर तैयार करने वाली तकनीक से शुरू हुई आम लोगों की दिलचस्पी 2022 में चैटजीपीटी के आने के बाद व्यापक बदलाव में बदल गई। अब एआई केवल सवालों के जवाब या सामग्री तैयार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि जटिल वैज्ञानिक और गणितीय समस्याओं को हल करने की दिशा में भी इस्तेमाल हो रही है।

आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. मणिन्द्र अग्रवाल के अनुसार, एआई की बढ़ती क्षमता के साथ इसके सुरक्षित और जिम्मेदार इस्तेमाल पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है। एआई मंथन की अध्यक्षता राज्यपाल आनंदी बेन पटेल कर रही है। इस समारोह में प्रदेश के सभी राज्य विश्वविद्यालयों के कुलपति सहित विभिन्न आईआईटी के विशेषज्ञ इसमें शामिल है।

प्रो. अग्रवाल ने कहा कि एआई के मौजूदा विकास में बड़े तंत्रिका नेटवर्क और शक्तिशाली कंप्यूटिंग प्रणालियों की अहम भूमिका रही। जीपीटी-3 में करीब 175 अरब पैरामीटर थे। इसके बाद बड़े भाषा मॉडल लगातार शक्तिशाली होते गए। वर्ष 2022 में ओपनएआई ने चैटजीपीटी को आम लोगों के लिए उपलब्ध कराया। इंसानों जैसी बातचीत करने और बड़ी मात्रा में सवालों के जवाब देने की क्षमता ने इसे कुछ ही समय में दुनिया भर में लोकप्रिय बना दिया। करीब दो महीने में इसके उपयोगकर्ताओं की संख्या 10 करोड़ तक पहुंच गई।

उन्होए कहा कि वर्ष 2023 में जीपीटी-4 के साथ मेटा का लामा और गूगल का जेमिनी भी चर्चा में आए। वर्ष 2024 में इनके और उन्नत संस्करण सामने आए। इस दौर में अमेरिका की बड़ी कंपनियों के बंद एआई माडलों का दबदबा रहा। इनके माडल में इस्तेमाल किए गए अरबों पैरामीटर का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया जाता था।

डीपसीक ने खोला खुले माडल का रास्ता

चीन की एआई कंपनी डीपसीक ने बंद माडलों की इस व्यवस्था को चुनौती दी। डीपसीक-वी3 को खुले माडल के रूप में उपलब्ध कराने से उपयोगकर्ताओं को इसे डाउनलोड कर स्थानीय स्तर पर चलाने का विकल्प मिला। इसके लिए हर बार बड़ी कंपनियों के सर्वर पर निर्भर रहना या भुगतान करना जरूरी नहीं रहा। इसके बाद गूगल, एक्सएआई और एंथ्रोपिक समेत कई कंपनियों ने भी नए और अधिक सक्षम माडल पेश किए।

सदियों पुरानी गणितीय समस्याओं पर नजर

प्रो. अग्रवाल ने कहा कि एआई की बढ़ती क्षमता का सबसे बड़ा असर वैज्ञानिक शोध में दिखाई दे रहा है। नेवियर-स्टोक्स समीकरण, रिमान परिकल्पना और हजकिन अनुमान जैसी जटिल गणितीय समस्याओं को लेकर एआई आधारित शोध और संभावित प्रगति के दावे सामने आए हैं। हालांकि ऐसे दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच जरूरी है, लेकिन इनसे यह संकेत जरूर मिलता है कि एआई जटिल वैज्ञानिक समस्याओं के समाधान में शोधकर्ताओं का महत्वपूर्ण उपकरण बन सकती है। इन समस्याओं की खासियत यह है कि उन्होंने मानव मस्तिष्क को लंबे समय से चुनौती दी है। ऐसे में एआई के जरिये इन पर तेजी से काम होना विज्ञान और मानव ज्ञान की दिशा में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।

भारत भी तैयार कर रहा स्वदेशी एआई

एआई की वैश्विक दौड़ में भारत ने भी स्वदेशी तकनीक विकसित करने पर जोर बढ़ाया है। सर्वम एआई जैसे प्रयासों के साथ भारतजेन पर काम हो रहा है। केंद्र सरकार ने एआई के अलग-अलग क्षेत्रों में उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने की पहल की है। आईआईटी कानपुर में टिकाऊ शहरों के लिए एआई आधारित समाधान, आईआईटी रुड़की में कृषि, भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु में स्वास्थ्य और आईआईटी मद्रास में शिक्षा से जुड़े समाधान विकसित किए जा रहे हैं।

2023 में उठी जोखिम की आवाज

एआई की तेज प्रगति के बीच वर्ष 2023 में दुनिया के प्रमुख एआई वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने इसके संभावित जोखिमों को लेकर चिंता जताई। जेफ्री हिंटन, सैम ऑल्टमैन और बिल गेट्स समेत कई विशेषज्ञों ने एआई के समाज पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों से आगाह करते हुए सक्रिय नियमन की जरूरत बताई। इसके अगले वर्ष 2024 में यूरोपीय संघ ने एआई एक्ट को मंजूरी दी, जिसे दुनिया का पहला व्यापक एआई कानून माना गया।

शिक्षा में बढ़ा इस्तेमाल, बढ़ी चुनौती

वर्ष 2025 तक शैक्षणिक संस्थानों में एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा। विद्यार्थी असाइनमेंट तैयार करने से लेकर परीक्षा संबंधी कार्यों तक में इसका सहारा लेने लगे। इससे मौलिकता, मूल्यांकन की विश्वसनीयता और विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता को लेकर नए सवाल खड़े हुए। अब चुनौती एआई के इस्तेमाल को पूरी तरह रोकने की नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को इसके जिम्मेदार और रचनात्मक उपयोग के लिए तैयार करने की है।

ताकत बढ़ी तो खतरे भी बढ़े

जिस तकनीक का इस्तेमाल बीमारी की पहचान, वैज्ञानिक शोध, शिक्षा और कृषि में किया जा सकता है, उसका दुरुपयोग साइबर हमलों और दूसरे नुकसानदायक कार्यों में भी संभव है। शक्तिशाली एआई माडल कंप्यूटर की कमजोरियां खोजने, भ्रामक सामग्री तैयार करने और बड़े पैमाने पर स्वचालित गतिविधियां संचालित करने में सक्षम होते जा रहे हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक समुदाय में एआई की सीमाओं, सुरक्षा और मानव नियंत्रण को लेकर बहस तेज हुई है।

एआई का सही इस्तेमाल जरूरी

अब सवाल केवल यह नहीं है कि एआई कितनी शक्तिशाली होगी, बल्कि यह है कि उसकी शक्ति का इस्तेमाल किस दिशा में किया जाएगा। विज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा और कृषि में इसका उपयोग मानव जीवन को बेहतर बना सकता है, लेकिन इसके गलत इस्तेमाल से गंभीर खतरे भी पैदा हो सकते हैं। इसलिए एआई के विकास के साथ सुरक्षा, पारदर्शिता, जिम्मेदार इस्तेमाल और प्रभावी नियमन की व्यवस्था करना आने वाले समय की बड़ी चुनौती होगी।

 

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