फसल के लिए ‘सोना’ बनी पराली: डीकंपोजर से खेत में ही बनाएं जैविक खाद, किसानों को मिलेगा दोहरा लाभ
पराली जलाना पर्यावरण और मिट्टी के लिए हानिकारक है, जिस पर भारी जुर्माना भी लग सकता है।

जौनपुर: करंजाकला क्षेत्र में पराली की जांच करते कृषि वैज्ञानिक।
HighLights
पराली जलाने पर भारी जुर्माना और सरकारी योजनाओं से वंचित।
बायो डीकंपोजर से पराली को जैविक खाद में बदलें।
पराली का धुआं पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा।
जागरण संवाददाता, जौनपुर। धान की कटाई के बाद खेतों में फसल अवशेष (पराली) जलाने की प्रवृत्ति पर्यावरण, मिट्टी की सेहत और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट बनती जा रही है।
कृषि विज्ञानियों का साफ संदेश है कि पराली कोई बेकार कचरा नहीं, बल्कि अगली फसल के लिए 'सोना' है। इसे आग के हवाले करने के बजाय आधुनिक तकनीकों और बायो डीकंपोजर के जरिए खेत में ही सड़ाकर उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद तैयार की जा सकती है।
सैटेलाइट से हो रही निगरानी, रकबे के आधार पर लगेगा जुर्माना
धान की फसल काटने के बाद किसान खेतों में पराली कदापि न जलाएं। शासन-प्रशासन ने पराली जलाने वालों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए पर्यावरण क्षतिपूर्ति और अर्थदंड का स्पष्ट प्रावधान किया है। इसके तहत दो एकड़ तक के कृषकों द्वारा पराली जलाने पर पांच हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।
वहीं, दो से पांच एकड़ तक की भूमि पर पराली जलाने की दशा में दस हजार रुपये का अर्थदंड देना होगा। यदि पांच एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में पराली जलाई जाती है, तो तीस हजार रुपये का भारी जुर्माना वसूला जाएगा और साथ ही संबंधित किसानों को सभी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से हमेशा के लिए वंचित कर दिया जाएगा।
इसके अतिरिक्त, खेतों की निरंतर निगरानी, आग लगने की घटनाओं की त्वरित जांच और मैपिंग के लिए जिला स्तर पर नोडल अधिकारियों की तैनाती के साथ फील्ड पेट्रोलिंग और तेज कर दी गई है।
पराली जलाने से बीमार हो जाती है मृदा, डीकंपोजर से बढ़ती है उर्वरा शक्ति
डिप्टी पीडी आत्मा रमेश चंद्र यादव ने तकनीकी तथ्य साझा करते हुए बताया कि खेतों में मात्र एक टन पराली जलाने से साठ किलोग्राम कार्बन मोनोआक्साइड, चौदह सौ साठ किलोग्राम कार्बन डाइआक्साइड, दो सौ किलोग्राम राख और दो किलोग्राम सल्फर डाइआक्साइड जैसी जहरीली गैसें उत्पन्न होती हैं। इससे न केवल पर्यावरण दूषित होता है, बल्कि मृदा की जीवनदायिनी संरचना और मित्र कीट भी नष्ट हो जाते हैं।
सेहत व पर्यावरण पर मंडराता गंभीर खतरा
सर्दियों के दिनों में पराली के धुएं, धूल और वाहनों के प्रदूषण का घातक मिश्रण हवा की गुणवत्ता को बेहद खराब कर देता है। कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. राजीव सिंह ने कहा कि पराली जलाने का सबसे अधिक और गंभीर खतरा मासूम बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं तथा दमा (अस्थमा) एवं हृदय रोगियों के स्वास्थ्य पर पड़ता है।
गांव के छोटे और सीमांत किसान अब महंगी मशीनें खुद खरीदने के बजाय ग्राम स्तर पर साझा मशीन केंद्रों (कस्टम हायरिंग सेंटर्स) से इन्हें बेहद मामूली किराए पर प्राप्त कर सकते हैं।
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