जागरण संवाददाता, जफराबाद (जौनपुर): एक तरफ सहालग जोरों पर है तो दूसरी ओर लोकतंत्र के महापर्व यानी लोकसभा चुनाव के लिए मतदान को भी महज बीस रोज बाकी रह गए हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता और समर्थक ही नहीं अवाम में भी जीत-हार को लेकर बहस का दौर तेज होता जा रहा है। जनवासे और निमंत्रण स्थल पर भी चुनावी अड़ी लगने लगी है। कन्या पक्ष के दरवाजे निमंत्रण करने पहुंचने वाले भी चुनावी बहस शुरू कर देते हैं। सभी हर समीकरण बैठाते हुए उसी को जीतता दिखाते हैं जिसके समर्थक होते हैं। कोई मोदी सरकार के सबका साथ, सबका विकास के मूल मंत्र के साथ पूरे पांच साल कार्य करने और प्रखर राष्ट्रवाद जगाने की दुहाई देते हुए भाजपा की जीत की वकालत करता है तो कोई परिवर्तन का नारा देते हुए सपा-बसपा गठबंधन के पक्ष में माहौल होने का दावा करता है। वहीं खांटी कांग्रेसी भी राहुल गांधी के जुझारू तेवर व लंबे इंतजार के बाद राजनीति के मैदान में कूद पड़ी प्रियंका वाड्रा से 'करिश्मे' की उम्मीद कर रहे हैं। इनकी बहस को सुनते हुए खामोशी के साथ फिजां का आंकलन करने वाले भी कम नहीं हैं।

शादी-विवाह में लकदक कुर्ता-पायजामा पहनकर पहुंचने वाले गांव-जवार के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए यही चुनावी चर्चा बड़ी मानसिक खुराक साबित हो रही है। जैसे किसी रेस्त्रां में एक चाय-समोसे का आर्डर देने और उसे निबटाने के बाद टेबल घेरकर बैठे रहने वालों से रेस्त्रां संचालक परेशान रहता है लेकिन मन मसोसकर बोलता कुछ नहीं वही हाल वही हाल इन दिनों निमंत्रक का हो गया है। चुनावी चर्चा में जहां जिस दल के समर्थक भारी पड़ते हैं वह अपनी जीत के दावे में इस कदर मुखर हो जाते हैं माहौल बिगड़ने का भी खतरा बन जाता है। ऐसे में जिसका संख्या बल कम होता है वह या तो चुपचाप सुनता है या फिर धीरे से उठकर चल देता है।

Posted By: Jagran

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