पितृपक्ष में खास है एक दिन, पंचमी-षष्ठी श्राद्ध का संयोग; जानें तर्पण और पिंडदान का महत्व
पितृपक्ष में गुरुवार को पंचमी और षष्ठी श्राद्ध का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे दोनों तिथियों का महत्व बढ़ ...और पढ़ें

गुरुवार को पंचमी एवं षष्ठी दोनों श्राद्ध तिथियां मानी जाएंगी। एआई इमेज
HighLights
पितृपक्ष में पंचमी और षष्ठी श्राद्ध का एक दिन संयोग।
गुरुवार को दोपहर 12:35 बजे तक पंचमी, फिर षष्ठी तिथि।
पितरों के लिए तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन, दान का महत्व।
जागरण संवाददाता, हापुड़। पितृपक्ष में इस बार एक ही दिन पंचमी और षष्ठी श्राद्ध का संयोग बन रहा है। वैदिक पंचांग की गणना के मुताबिक आज (बृहस्पतिवार) को पंचमी तिथि दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगी। इसके बाद षष्ठी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। ऐसे में गुरुवार को पंचमी एवं षष्ठी दोनों श्राद्ध तिथियां मानी जाएंगी।
श्राद्ध विधि-विधान से करना महत्वपूर्ण
ज्योतिर्विद पंडित सुबोध पांडेय ने बताया कि पितृपक्ष में प्रत्येक श्राद्ध तिथि का अपना विशेष धार्मिक महत्व है। जिन परिवारों में दिवंगत परिजन की मृत्यु तिथि आश्विन कृष्ण पक्ष की पंचमी या षष्ठी रही हो, उनके लिए संबंधित तिथि का श्राद्ध विधि-विधान से करना महत्वपूर्ण माना गया है।
सुख-शांति एवं मंगल की कामना
श्राद्ध कर्म में पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और यथाशक्ति दान-पुण्य किया जाता है। इन धार्मिक कर्मों के माध्यम से पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
श्राद्ध के दौरान सात्त्विकता, श्रद्धा और शास्त्रीय विधि का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र एवं जरूरत की अन्य वस्तुओं का दान किया जा सकता है। वहीं, पितरों का स्मरण कर परिवार की सुख-शांति एवं मंगल की कामना की जाती है।
