हापुड़ में हादसों को न्योता दे रहे गड्ढे, फिर भी बेखबर अधिकारी
हापुड़ में सड़कों के गड्ढे जानलेवा साबित हो रहे हैं, एक साल में नौ लोगों की मौत के बावजूद पीडब्ल्यूडी ...और पढ़ें

गड्डे ले रहे लोगों की जान ( फोटो स्रोत : जागरण )
HighLights
हापुड़ में गड्ढों से एक साल में 9 मौतें हुईं।
पीडब्ल्यूडी, एनएचएआई अधिकारियों की घोर लापरवाही उजागर।
मरम्मत कार्य में गुणवत्ता की अनदेखी, धन की बर्बादी।
ठाकुर डीपी आर्य, हापुड़। सड़कों के गड्ढे राहगीरों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभागों के अधिकारी इनको ठीक कराने को लेकर गंभीर नहीं हैं। कहीं गड्ढे में बाइक फिसल रही है, तो कहीं वाहन अनियंत्रित होकर लोगों की जान ले रहे हैं।
इसके बावजूद पीडब्ल्यूडी और एनएचएआई के अफसरों की कार्यशैली में कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा। एक साल में नौ लोगों की मौत के बाद भी किसी जिम्मेदार की जवाबदेही तय नहीं हुई। शिकायतें लगातार होती रहीं, हादसे सामने आते रहे, लेकिन कार्रवाई और सुधार के नाम पर नतीजा सिफर रहा।
जिम्मेदारों पर क्यों नहीं हो रही कार्रवाई
हाईवे से लेकर लिंक रोड तक गहरे गड्ढे विभागीय दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई उजागर कर रहे हैं। सवाल यह है कि एक साल में नौ मौतों के बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इसके साथ ही सड़कों को सुरक्षित बनाने के लिए ठोस कदम कब उठाए जाएंगे?
विडंबना यह है कि सड़कों के गड्ढे भरने की जिम्मेदारी संभालने वाले विभागों की मरम्मत व्यवस्था भी हादसों को न्योता दे रही हैं। शिकायत मिलने पर गड्ढे भरने की औपचारिकता तो पूरी कर दी जाती है, लेकिन सड़क का लेवल दुरुस्त करने और मरम्मत की गुणवत्ता जांचने की जहमत नहीं उठाई जाती।
कहीं सड़क से दो-तीन इंच ऊंचा तो कहीं नीचे पैचवर्क कर जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं। निर्माण और मरम्मत के दौरान निगरानी नदारद रहती है और हादसा होने पर वाहन चालकों की लापरवाही गिना दी जाती है।
किस काम में खर्च हो रहा सरकारी धन?
सवाल यह है कि जब मरम्मत के बाद भी हादसे नहीं रुक रहे तो सरकारी धन आखिर किस काम में खर्च हो रहा है? हर साल गड्ढे भरने के नाम पर लाखों रुपये खर्च दिखाए जाते हैं, लेकिन सड़कों की हालत जस की तस बनी रहती है।
बजट खर्च होने का हिसाब तो मिल जाता है, मगर सुरक्षित सड़क की गारंटी कहीं नजर नहीं आती।
वास्तविकता यह है कि पीडब्ल्यूडी समेत कई निर्माण विभाग सड़क निर्माण और मरम्मत से जुड़े मानकों की अनदेखी कर रहे हैं।
नियमानुसार सड़कों का निर्माण और मरम्मत विशेषज्ञ इंजीनियरों की निगरानी में होना चाहिए। निर्माण सामग्री की गुणवत्ता से लेकर सड़क का लेवल, ढलान और जल निकासी तक की जिम्मेदारी संबंधित इंजीनियर की होती है। गड्ढों की मरम्मत में भी इन्हीं मानकों का पालन जरूरी है। इसके बावजूद मौके पर निगरानी के बजाय पूरा काम ठेकेदारों के भरोसे छोड़ दिया जाता है।
कागजों तक सिमटी रहती है इंजीनियरों की भूमिका
ठेकेदार मेट और कामगारों के जरिए काम कराते हैं और इंजीनियरों की भूमिका कागजी निगरानी तक सिमट जाती है। जिस तकनीकी काम के लिए सरकार इंजीनियरों पर लाखों रुपये खर्च करती है, उसकी जिम्मेदारी दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के भरोसे छोड़ दी जाती है। इससे गुणवत्ता प्रभावित होती है और सरकारी धन की बर्बादी का रास्ता खुलता है।
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गड्ढ़ों को ठीक कराने का प्रयास किया जा रहा है। किसी की मौत होने पर हम उच्चाधिकारियों को रिपोर्ट भेज देते है। उसके बाद क्या कार्रवाई होती है, इतना याद नहीं रहता। लोगों को गडढ़ों से बचकर चलने की जरूरत हे। हम जल्द ही इनको ठीक करा देंगे। जिसकी जहां मोत आ गई, वहीं होती है।- संदीप कुमार - एई- धोलाना क्षेत्र।
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