हमीरपुर के मौदहा की 'तैरती' चांदी की मछली...अब खो रही है वजूद, दीवानी थी दुनिया, आईना-ए-अकबरी में भी जिक्र
हमीरपुर के मौदहा की चांदी की मछली कला, जो कभी विदेशों में भी प्रसिद्ध थी, अब अपने कद्रदान खो रही ...और पढ़ें

चांदी की मछली। इंटरनेट मीडिया
HighLights
कभी विदेशों में थी पहचान, अब नहीं मिल रहे मौदहा की चांदी की मछली के कद्रदान
वर्ष 1981 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने दुकानदार को किया था सम्मानित
आईना-ए-अकबरी में भी अबुल फजल ने किया इस मछली का विशेष जिक्र
अनुराग मिश्रा, हमीरपुर। हिंदू परंपरा में मछली को शुभ माना जाता है। हिंदू घरों में जीवित मछलियों को पालने की भी परंपरा है। जिस तरह से दशहरे के दिन नीलकंठ को देखना शुभ माना जाता है। ठीक उसी तरह से जीवित मछली को देखना भी शुभ मानते है। यही कारण है कि कि हाथों के हुनर से तैयार जीवित सी दिखने वाली चांदी की मछली नए साल, त्योहार, वर्षगांठ, और अन्य शुभ अवसरों पर गिफ्ट देना एक रिवाज सा बन गया है। लेकिन अब इसके कद्रदान नहीं नजर आ रहे हैं।
चांदी की मछली हमीरपुर के मौदहा कस्बे में बनती है। इन मछलियों ने एक समय विदेशों में भी धूम मचा रखी थी। लेकिन दिनों दिन अब इसके कद्रदान घटते जा रहे हैं। यदि पूरे इस कला के संरक्षण के लिए सरकार ने कोई उपाय नहीं किया तो आने वाले दिनों में यह कला लुप्त हो जाएगी।

तत्कालीन मुख्यमंत्री के द्वारा दिए गए पुरस्कार को दिखाते दुकानदार राजेंद्र कुमार सोनी। जागरण
कस्बा मौदहा निवासी चांदी की मछली निर्माता राजेंद्र कुमार सोनी ने बताया कि उनके पिता स्व.जागेश्वर प्रसाद को 1981 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सम्मानित किया था। हमारे परिवार के अलावा भारत में कहीं भी इस तरह की सजीव दिखने वाली मछली नहीं बनती है। हमारे पूरे परिवार का भरण-पोषण भी इसी कला की वजह से होता है। लेकिन अब इस कला का कोई कद्रदान नहीं नजर आ रहा है।

मौदहा में तैयार की गई चांदी की मछली। जागरण
चरखारी महाराजा की नुमाइश में सम्मान पाने की चाहत में इस कला को दिया था जन्म
इस अनोखी कला का इतिहास कई सदियों पुराना है। सर्राफ परिवार के बुजुर्ग गुलाबदास ने चरखारी महाराजा की नुमाइश में सम्मान पाने की चाह में इस कला को जन्म दिया था। गुलाबदास द्वारा बनाई गई ऐसी जादुई चांदी की मछली, जो पानी में छोड़ते ही तैरने लगती थी, को देखकर महाराजा दंग रह गए थे। उन्होंने गुलाबदास को 52 गज का साफा बांधकर सम्मानित किया था।
आईना-ए-अकबरी में भी अबुल फजल ने किया इस मछली का विशेष जिक्र
इतिहास के पन्नों में इस कला का खास मुकाम रहा है। वर्ष 1810 में इसी परिवार के तुलसीदास ने यह मछली क्वीन विक्टोरिया को भेंट की थी, जिससे खुश होकर क्वीन ने उन्हें तांबे के मेडल से नवाजा था। मुगल काल में मशहूर इतिहासकार अबुल फज़ल ने भी अपनी प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति आईना-ए-अकबरी में इस मछली का विशेष ज़िक्र किया है। दिल्ली के प्रगति मैदान और चेन्नई के स्वामी विवेकानंद मेले में भी इस कला को खूब सराहना और पुरस्कार मिले हैं।
पांच ग्राम से लेकर ढाई किलो तक के वजन वाली तैयार होती है मछली
मौदहा के राजेंद्र सोनी और उनके परिवार के पास ही यह हुनर बचा है, जो देश में और कहीं देखने को नहीं मिलता। यह मछली पांच ग्राम से लेकर 2.5 किलोग्राम तक के वजन में हाथों से गढ़ी जाती है, जिसकी कीमत वर्तमान में 1500 रुपये से लेकर 5.5 लाख रुपये तक होती है। दुकानदार ने बताया कि शासन-प्रशासन से किसी भी प्रकार की वित्तीय सहायता या प्रोत्साहन न मिलने के कारण यह कला केवल बुंदेलखंड तक सिमट कर रह गई है। पर्याप्त मुनाफा न होने के कारण उन्होंने अपनी अगली पीढ़ी को इस व्यापार से दूर रखा है। उनके बच्चे कालेज और यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त कर अब सिर्फ नौकरी की राह चुन रहे हैं।
