गोरखपुर आयुष विश्वविद्यालय में मोनोपोली दवाओं का खेल खत्म, मरीजों को मिली राहत
दैनिक जागरण की खबर के बाद गोरखपुर के आयुष विश्वविद्यालय में मोनोपोली दवाओं पर लगाम लगी है। चिकित्सकों ने शास्त्रीय ...और पढ़ें

HighLights
दैनिक जागरण की खबर के बाद मोनोपोली दवाओं पर कार्रवाई।
आयुष विश्वविद्यालय के पर्चों से महंगी मोनोपोली दवाएं हुईं गायब।
मरीजों को अब मिल रही हैं सस्ती शास्त्रीय औषधियां।
हरेराम पांडेय, भटहट, (गोरखपुर)। चिकित्सकों संग साठगांठ कर मोनोपोली की दवाएं बेचकर रोगियों की जेब पर डाका डाल रहे धंधेबाज बुधवार को सकते में रहे। आलम यह रहा कि सुबह ही आयुष विश्वविद्यालय के निकट स्थित मेडिकल स्टोरों पर कंपनियों के एमआर पहुंचे और ऐसी दवाएं वापस ले गए। वहीं, आयुष विश्वविद्यालय की ओपीडी के पर्चों से भी मोनोपोली की औषधियां गायब दिखीं। चिकित्सकों ने वही औषधियां पर्चे पर लिखीं जो विश्वविद्यालय की फार्मेसी में निश्शुल्क वितरण के लिए उपलब्ध हैं।
बता दें कि आयुष ही नहीं, एलोपैथ चिकित्सकों के बीच भी मोनोपोली दवाओं का जाल फैला है। कमीशन के दम पर मोनोपोली दवाओं के इस काले कारोबार पर बुधवार को दैनिक जागरण में ''उपचार में मोनोपोली, रोगियों को लूट रही गोली'' शीर्षक से छपी खबर ने तगड़ा प्रहार किया। इसका असर बुधवार सुबह ही महायोगी गुरु गोरखनाथ आयुष विश्वविद्यालय में देखने को मिला। खबर प्रकाशित होने के बाद विश्वविद्यालय का माहौल बदला-बदला नजर आया।
जहां एक तरफ चिकित्सक मोनोपोली दवाओं की जगह शास्त्रीय योग वाली औषधियों के नाम पर्चे पर लिखते नजर आए, वहीं दूसरी ओर तीन गुणा दाम बढ़ाने वाली कंपनी में हड़कंप मच गया। मेडिकल स्टोर संचालकों ने बताया कि जिस कंपनी का इटोलिव कैप्सूल का दाम 150 से बढ़ाकर 450 रुपये कर दिया गया था, उसके प्रतिनिधि बुधवार को अचानक विश्वविद्यालय गेट के सामने स्थित दुकानों पर पहुंचे और अपनी सारी औषधियां वापस लेकर रफूचक्कर हो गए।
इस खबर की मेडिकल स्टोर संचालकों में खासी चर्चा रही। दुकानदारों ने बताया कि मोनोपोली दवाओं का सबसे अधिक लाभांश दवा कंपनियों और लिखने वाले चिकित्सकों को ही मिलता है। दुकानदार को इसमें नाममात्र का मार्जिन मिलता है, उल्टा मरीजों की नाराजगी झेलनी पड़ती है। उधर, ओपीडी में आए रोगियों को महंगी मोनोपोली दवाओं के बजाय शास्त्रीय औषधियां लिखी गईं, जिससे उन्हें काफी राहत मिली। मरीजों ने कहा कि यदि यही व्यवस्था रोज रहती है तो उनका इलाज का खर्च आधा हो जाएगा।
एलोपैथ में गहरी हैं मोनोपोली दवाओं की जड़ें
आयुष पद्धति की दवाओं में मोनोपोली चलाने वाली कंपनियों पर खबर का असर देखने को मिला, तो बाजार से जुड़े सूत्रों ने एलोपैथिक दवाओं में मोनोपोली की जानकारी दी। कई निजी अस्पतालों में मरीजों को जो दवाएं लिखी जाती हैं, वो उनके मेडिकल स्टोर के अलावा कहीं और नहीं मिल पाती हैं। ऐसे में रोगी मजबूरन महंगी दवाएं खरीदते हैं।
यह भी पढ़ें- रेलकर्मियों के लिए जरूरी खबर, 78 दिन के बोनस और 41,149 रुपये का दावा निकला फर्जी
आइएमए और प्रशासन को आना होगा आगे
छात्र नेता शशितेश सिंह ''भोलू'' ने बताया कि मोनोपोली के इस काले कारोबार का खामियाजा गरीब रोगियों के लिए उपचार को कठिन कर देता है। कई बार रोगी पैसों की कमी के चलते उपचार बीच में ही छोड़ देते हैं। रोगियों की इस परेशानी को देखते हुए आइएमए और प्रशासन को पहल करनी चाहिए। आइएए के पदाधिकारियों को ऐसे चिकित्सकों चिह्नित कर कार्रवाई करना चाहिए। प्रशासन को भी इसे लेकर जांच कर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
