मुफ्त के भोजन ने बदला बंदरों का मिजाज, गोरखपुर में इंसानी बस्तियों की ओर क्यों बढ़ रहा आतंक?
गोरखपुर में बंदरों का आतंक बढ़ रहा है, जिससे रुस्तमपुर समेत कई इलाकों में लोग परेशान हैं और कई लोग ...और पढ़ें

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण
HighLights
गोरखपुर में बंदरों का आतंक बढ़ा, कई लोग घायल हुए।
नगर निगम को बंदर पकड़ने वाली एजेंसी नहीं मिल रही।
लोगों द्वारा खाना खिलाना बंदरों के व्यवहार को बदल रहा।
अरुण चन्द, गोरखपुर। रुस्तमपुर के कजाकपुर क्षेत्र में बंदरों से लोग परेशान हैं। दो दिन में तीन लोगों को बंदर काट चुका है। नगर निगम परिसर में ही एक बंदर के दौड़ाए जाने से स्कूटर सवार युवक गिर गया और उसे काफी चोटें आईं। कुछ दिन पहले एमएमयूटी की एक छात्रा को बंदर ने काट लिया। यह तो बानगी है। आवारा कुत्तों की ही तरह अब बंदर भी रोज शहर के किसी न किसी हिस्से में लोगों को काट ले रहे।
शहर में बंदरों के बढ़ते आतंक के बीच समस्या केवल बंदरों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं है। सड़क किनारे और शहर के विभिन्न हिस्सों में लोगों द्वारा बंदरों को खाना खिलाने की आदत भी उन्हें आबादी की ओर खींचने का काम कर रही है। जंगल के आसपास या रास्तों में आसानी से भोजन मिलने के कारण बंदरों का इंसानी बस्तियों में आना बढ़ रहा है।
नतीजा यह है कि अब घरों, बाजारों और प्रमुख सड़कों पर बंदरों के झुंड दिखाई दे रहे हैं। बावजूद नगर निगम की बंदर पकड़ने की व्यवस्था जमीन पर प्रभावी नहीं हो पा रही है। यानी निगम के सामने दोहरी चुनौती है। बंदर पकड़ने का इंतजाम तो करना ही है, लोगों को भी जागरूक करना पड़ेगा।
नए शासनादेश के जरिये शासन स्पष्ट कर चुका है कि शहरी क्षेत्रों में बंदरों को पकड़ने, उनका परिवहन करने और सुरक्षित स्थान पर छोड़ने की जिम्मेदारी नगर निगम की है। यह जिम्मेदारी पहले से ही नगर निगम को दी जा चुकी है। इसके तहत निगम प्रशासन ने बंदर पकड़ने के लिए दो बार निविदा प्रक्रिया अपनाई, लेकिन किसी भी फर्म या एजेंसी ने काम लेने में रुचि नहीं दिखाई। हालांकि निगम के पशु कल्याण अधिकारी डा. रोबिन चंद्र दावा कर रहे कि तीसरी बार के टेंडर में दो फर्म क्वालीफाई हुई है। जल्द ही टेंडर फाइनल हो जाएगा।
नगर निगम के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब शासन ने प्रति बंदर पकड़ने, परिवहन और सुरक्षित स्थान पर छोड़ने के लिए करीब 925 रुपये की दर तय कर रखी है, तब भी एजेंसी क्यों नहीं मिल रही। अधिकारियों के अनुसार बंदरों को पकड़ने के लिए प्रशिक्षित टीम, विशेष तकनीक और सुरक्षा इंतजाम की जरूरत होती है। बंदरों के हमलावर होने की स्थिति में कर्मचारियों और आसपास के लोगों की सुरक्षा भी चुनौती है। यही वजह निजी एजेंसियों की अरुचि का कारण मानी जा रही है।

भोजन की आसान राह बदल रहा बंदरों का व्यवहार
बंदरों को सड़क किनारे केला, फल या अन्य खाद्य सामग्री खिलाना देखने में भले ही दया और पुण्य का काम लगे, लेकिन लगातार और आसानी से मिलने वाला भोजन उनके प्राकृतिक व्यवहार को बदल रहा है। जंगल में भोजन की तलाश में पेड़-पौधों, फलों, बीजों, पत्तियों और दूसरे प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर रहने वाला बंदर अब आबादी में मुफ्त भोजन पाने लगा है, जिससे उसकी गतिविधियों का दायरा ही बदलने लगा है। वह भोजन तलाशने के बजाय उस स्थान पर लौटना सीख रहा है, जहां मनुष्य से आसानी से खाना मिल जाता है।
गोरखपुर में कुसम्ही क्षेत्र, फरेंदा मार्ग, लेहड़ा देवी मंदिर और तरकुलहा देवी मंदिर के आसपास सड़क किनारे बड़ी संख्या में बंदरों का जमा होना इसी बदलाव का उदाहरण माना जा सकता है। वन्यजीव एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहे मनीष चौबे और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर अनिल कुमार तिवारी भी खुले में भोजन उपलब्ध कराने को बंदरों की मानव आबादी पर निर्भरता और व्यवहार में बदलाव से जोड़ते हैं।
आसान भोजन मिला तो जंगल की तलाश क्यों करें
मनीष चौबे कहते हैं कि बंदर स्वभाव से अत्यंत बुद्धिमान और अवसरवादी जीव हैं। जंगल में भोजन प्राप्त करने के लिए उन्हें लगातार घूमना, पेड़ों पर चढ़ना, अलग-अलग वनस्पतियों और फलों को तलाशना पड़ता है। इसके साथ उनका शरीर और व्यवहार प्राकृतिक पर्यावरण के अनुरूप सक्रिय रहता है। इसके विपरीत सड़क, मंदिर या आबादी के आसपास रोजाना भोजन मिलने लगे तो ऊर्जा खर्च किए बिना भोजन प्राप्त करने की आदत विकसित होती है।
वन्यजीवों के अध्ययन में भी पाया गया है कि मनुष्य द्वारा दिया जाने वाला भोजन बंदरों की भोजन तलाशने की गतिविधि, आवास चयन और आवाजाही के तरीके को बदल सकता है। यही वजह है कि भोजन मिलने वाले स्थान धीरे-धीरे बंदरों के नियमित ठिकाने बन जा रहे हैं। लगातार एक ही जगह भोजन मिलने से बड़े झुंड भी वहां जुट सकते हैं और आबादी में उनकी मौजूदगी बढ़ सकती है।
प्राकृतिक भोजन की तलाश से जंगल को भी फायदा
विशेषज्ञों का कहना है कि जंगल में बंदरों का भोजन केवल उनके पेट भरने तक सीमित नहीं है। फल और बीज खाने तथा उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने से वे बीज प्रसार में भूमिका निभाते हैं। वे जंगल के अलग-अलग हिस्सों में घूमते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी प्राकृतिक भूमिका बनी रहती है।
प्राकृतिक भोजन की तलाश में उनकी आवाजाही दूसरे जीवों और वनस्पतियों के साथ उनके संबंध को भी बनाए रखती है।
इसके विपरीत यदि भोजन सड़क या मंदिर के बाहर तैयार मिल जाए तो उनकी गतिविधियां कुछ सीमित क्षेत्रों में सिमटने लगती हैं। अध्ययन बताते हैं कि मनुष्य से मिलने वाला भोजन प्राइमेट के भोजन व्यवहार, आवाजाही और सामाजिक व्यवहार में बदलाव ला सकता है।
फल-रोटी से पेट भरता है, पोषण नहीं
मनीष कहते हैं कि मनुष्य के लिए बनाया गया भोजन बंदरों के लिए जरूरी नहीं कि संतुलित भोजन हो। फल के नाम पर अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थ, बिस्कुट, रोटी, नमकीन या अन्य प्रसंस्कृत खाद्य लगातार मिलने से उनके प्राकृतिक आहार की संरचना बदल सकती है। इससे पोषण संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ता है।
वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट में भी मानव द्वारा भोजन दिए जाने को प्राइमेट के आहार की मात्रा और संरचना बदलने वाला महत्वपूर्ण मानवीय हस्तक्षेप बताया गया है। इसके अलावा सड़क किनारे फेंका गया भोजन अक्सर प्लास्टिक, पालीथिन और अन्य कचरे के साथ होता है। इसे खाने पर आंतों में रुकावट, चोट या गंभीर स्वास्थ्य समस्या का खतरा रहता है। मानव आबादी के करीब आने से वाहन दुर्घटना और दूसरी मानवीय गतिविधियों से चोट का जोखिम भी बढ़ता है।
भोजन ने बदला तो व्यवहार भी बदल सकता है
सबसे गंभीर असर व्यवहार पर पड़ता है। जिस बंदर को यह अनुभव हो जाए कि मनुष्य के पास खाना है, वह भोजन के लिए उसके करीब जाने, छीनने या डराने का व्यवहार सीख सकता है। मंदिरों, राजमार्गों और घरों की छतों पर भोजन मिलने से बंदरों के भोजन छीनने और लोगों पर हमला करने जैसी घटनाओं से संबंध बताया जा रहा है।
कोटा के वन अधिकारी का वीडियो चर्चा में
राजस्थान के कोटा के वन अधिकारी अनुराग भटनागर के नाम से प्रसारित वीडियो में भी इसी मूल समस्या की ओर ध्यान दिलाया गया है कि वन्यजीवों को मनुष्य के भोजन का अभ्यस्त बनाना उनके स्वाभाविक व्यवहार के लिए उचित नहीं है। भटनागर वन्यजीव प्रबंधन से जुड़े अधिकारी हैं और कोटा के वन्यजीव क्षेत्रों में प्राकृतिक जलस्रोतों और वन्यजीवों की गतिविधियों की निगरानी से जुड़े रहे हैं। इसका मूल संदेश यही है कि वन्यजीव के प्रति वास्तविक संवेदना उसे मनुष्य पर निर्भर बनाना नहीं, बल्कि उसके प्राकृतिक आवास और प्राकृतिक भोजन को सुरक्षित रखना है।
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इसलिए बंदरों को सड़क, मंदिर या आबादी में खाना खिलाने के बजाय उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना, जंगल में फलदार एवं स्थानीय वनस्पतियां बढ़ाना और कचरा खुले में न डालना ज्यादा स्थायी उपाय है। इससे बंदर जंगल में रहकर अपनी प्राकृतिक भूमिका निभाएंगे और मनुष्य-बंदर टकराव की गुंजाइश भी कम होगी।
