गोरखपुर में तकनीक संग कला का कमाल, जब हाथ जोड़ती हैं मां दुर्गा और दहाड़ता है शेर
गोरखपुर के मूर्तिकार सुशील गुप्ता मोटर व तकनीक का उपयोग कर ऐसी दुर्गा प्रतिमाएं बनाते हैं जो हिलती-डुलती और महिषासुर ...और पढ़ें
HighLights
गोरखपुर के सुशील गुप्ता बनाते हैं स्वचालित दुर्गा प्रतिमाएं।
ये प्रतिमाएं गर्दन घुमाती, हाथ हिलाती और महिषासुर वध दर्शाती हैं।
तकनीकी जटिलता से साल में केवल 10-12 प्रतिमाएं बनती हैं।
संगम दूबे, गोरखपुर। मां दुर्गा की प्रतिमा महिषासुर का वध करती हैं, उनका हाथ आशीर्वाद देने के लिए उठता है और गर्दन भी हिलती है। पास खड़ा शेर चलता ही नहीं, बल्कि दहाड़ता भी नजर आता है। यह किसी चलचित्र का दृश्य नहीं, बल्कि गोरखपुर के सिंघड़िया में तैयार होने वाली स्वचालित दुर्गा प्रतिमाओं का कमाल है।
यहां मूर्तिकार सुशील गुप्ता और उनके सहयोगी भास्कर अपनी कला और तकनीक के मेल से ऐसी प्रतिमाएं तैयार करते हैं, जो देखने वालों को हैरान कर देती हैं। इनकी खासियत है कि बिजली या मैनुअल तरीके से संचालित होने वाली इन प्रतिमाओं के अंगों को जरूरत के मुताबिक गति दी जा सकती है।
सुशील ने लखनऊ आर्ट्स कालेज से मूर्तिकला में स्नातक की पढ़ाई की है। वर्ष 1987 में पहली बार गोरखपुर आने के बाद उन्होंने यहां अपनी कला को नई पहचान दी। शुरुआती दिनों में उनकी बनाई प्रतिमाओं को देखने के लिए शहर में लोगों की भीड़ जुटती थी। दूर-दूर से लोग इस अनूठी कला को देखने आते थे। सुशील बताते हैं कि एक समय उत्तराखंड और नैनीताल तक प्रतिमाएं लेकर जाना पड़ता था, लेकिन अब गोरखपुर में ही प्रतिमाएं तैयार कर मांग के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर भेज दी जाती हैं।

हर प्रतिमा के पीछे होती है अलग कहानी
इन प्रतिमाओं को तैयार करना सामान्य मूर्तिकला से कहीं अधिक जटिल है। सबसे पहले प्रतिमा का स्वरूप तैयार किया जाता है। इसके बाद फाइबर से शरीर की ढलाई कर उसमें मोटर और गति देने वाली व्यवस्था लगाई जाती है। प्रतिमा के स्वरूप और आयोजन समिति की मांग के अनुसार उसका संचालन तय होता है। कई बार इसके लिए अलग स्क्रिप्ट भी तैयार की जाती है, ताकि प्रतिमा के अलग-अलग हिस्से एक निश्चित क्रम में गति कर सकें।

सुशील बताते हैं कि मां दुर्गा के महिषासुर वध का दृश्य इस तकनीक का खास उदाहरण है। इसमें मां दुर्गा के हाथ और गर्दन की गति के साथ महिषासुर का सिर अलग होने का दृश्य भी दिखाया जा सकता है। इस बार उन्होंने नारियल के आकार में एक विशेष संरचना तैयार की है, जिसमें से मां दुर्गा प्रकट होंगी। भगवान शिव और भगवान नरसिंह की स्वचालित प्रतिमाएं भी उनकी कलाकारी के उदाहरण हैं।

मांग अधिक, लेकिन मेहनत के आगे सीमित उत्पादन
प्रतिमाओं की मांग गोरखपुर के अलावा बिहार, बंगाल और नेपाल तक है। इसके बावजूद समय और तकनीकी जटिलता के कारण एक साल में केवल 10 से 12 प्रतिमाएं ही तैयार हो पाती हैं। सुशील के सहयोगी भास्कर भी मूर्तिकला में दक्ष हैं। वह गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं और राज्य ललित कला अकादमी से पुरस्कृत हो चुके हैं।
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वे बताते हैं कि इन प्रतिमाओं की एक और विशेषता यह है कि इन्हें विसर्जित नहीं किया जाता। इनका उपयोग केवल प्रदर्शन के लिए होता है, जबकि विसर्जन के लिए छोटी प्रतिमाएं रखी जाती हैं। इस तरह तकनीक और कलात्मक कौशल से तैयार ये प्रतिमाएं धार्मिक आयोजनों को नया रूप देने के साथ कला की एक अलग परंपरा भी विकसित कर रही हैं।
