1971 के युद्ध से जगुआर के गर्जन तक, देश की आसमानी ढाल बना गोरखपुर एयर फोर्स स्टेशन
गोरखपुर एयर फोर्स स्टेशन, जिसकी स्थापना 15 जून 1963 को हुई थी, ने छह दशकों से देश की हवाई सुरक्षा ...और पढ़ें

भारतीय वायु सेना दिवस पर विशेष
HighLights
15 जून 1963 को स्थापित, 17 विंग ने निभाई अहम भूमिका।
1971 युद्ध में सक्रिय भागीदारी, पूर्वी-पश्चिमी मोर्चों पर अभियान।
जगुआर लड़ाकू विमान प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
जागरण संवाददाता, गोरखपुर। भारतीय वायुसेना की गौरवगाथा में गोरखपुर एयर फोर्स स्टेशन का भी खास स्थान है। 15 जून 1963 को यहां नंबर 17 विंग की स्थापना हुई थी। 1962 के चीन युद्ध के बाद देश की उत्तरी और पूर्वी सीमाओं की सुरक्षा तथा सैन्य साजोसामान और जवानों की तेजी से आवाजाही की जरूरत को देखते हुए इसका गठन किया गया।
स्टेशन के इतिहास का अहम अध्याय 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, उस समय यहां तैनात कैनबरा स्क्वाड्रन ने पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान, दोनों मोर्चों पर अभियान में हिस्सा लिया और हमले किए। विजय दिवस पर स्टेशन में आयोजित कार्यक्रमों में इस योगदान को याद किया जाता है। गोरखपुर एयर फोर्स स्टेशन पूर्वी उत्तर प्रदेश की सामरिक सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। समय के साथ भारतीय वायुसेना के अभियानों, प्रशिक्षण और संचालन में इसकी भूमिका भी बदली है।
जगुआर प्रशिक्षण का अहम केंद्र
गोरखपुर की पहचान जगुआर लड़ाकू विमान से जुड़े प्रशिक्षण ढांचे के कारण भी है। यहां नंबर 4 टेक्निकल टाइप ट्रेनिंग स्कूल की महत्वपूर्ण भूमिका है। सैन्य इतिहास के उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार, यह इकाई पहले अंबाला में जगुआर मोबाइल कनवर्जन फ्लाइट के रूप में थी और अप्रैल 1988 में गोरखपुर स्थानांतरित हुई। बाद में इसे नंबर 4 टेक्निकल टाइप ट्रेनिंग स्कूल के रूप में विकसित किया गया।
2006 की एक रिपोर्ट के अनुसार, यहां जगुआर विमानों से जुड़े पायलटों, एयरोनाटिकल इंजीनियरों, तकनीशियनों और अन्य विशेषज्ञों को प्रशिक्षण दिया जाता था। इस तरह स्टेशन की भूमिका विमान उड़ाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि लड़ाकू विमानों की तकनीकी दक्षता और संचालन के लिए मानव संसाधन तैयार करने में भी इसका योगदान रहा।
रक्षा और नागरिक विमानन का साझा उपयोग
गोरखपुर एयर फोर्स स्टेशन का हवाई क्षेत्र रक्षा और नागरिक, दोनों तरह के विमानों के संचालन में इस्तेमाल होता है। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के वर्तमान विमानन प्रकाशन में इसे भारतीय वायुसेना से संबद्ध संयुक्त उपयोग वाला एयरफील्ड बताया गया है। यह शहर से करीब छह किलोमीटर पूर्व में स्थित है।
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1932 से बदलती वायुसेना
आठ अक्टूबर 1932 को शुरू हुई भारतीय वायुसेना आज आधुनिक लड़ाकू विमानों, हेलिकाप्टरों, परिवहन विमानों, एयरबोर्न सिस्टम और सटीक हथियार प्रणालियों से लैस बल बन चुकी है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, पहली परिचालन उड़ान में छह प्रशिक्षित अधिकारी और 19 हवाई सिपाही थे। 1930 के दशक में ही वायुसेना ने उत्तर-पश्चिमी सीमांत पर अभियानों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था।
