गोरखपुर की बर्डघाट रामलीला: सात दशक पुराने वस्त्राभूषणों में चमक रही Ram Leela की विरासत
बर्डघाट रामलीला में 73 साल पुराने मुकुट और आभूषण आज भी रामकथा की विरासत को सहेजे हुए हैं। ये पारंपरिक ...और पढ़ें

सात दशक पुराने वस्त्राभूषणों में चमक रही Ram Leela की विरासत।
HighLights
बर्डघाट रामलीला के 73 साल पुराने आभूषण विरासत सहेजते हैं।
राम-रावण के मुकुट सोने-चांदी के तारों से बुने गए हैं।
कारीगरों की कमी के बावजूद प्राचीन वस्त्राभूषण संरक्षित किए जा रहे हैं।
जागरण संवाददाता, गोरखपुर। बर्डघाट की रामलीला केवल रामकथा के मंचन की परंपरा नहीं है, बल्कि विरासत को सहेजने की एक अनूठी मिसाल भी है। यहां भगवान श्रीराम सहित रामलीला के प्रमुख पात्रों के मुकुट, कवच, बाजूबंद और अन्य आभूषण करीब 73 वर्ष पुराने हैं।
समिति ने इन्हें किसी अनमोल धरोहर की तरह संभालकर रखा है। खास बात यह है कि समय के साथ कलाकारों के वस्त्र कई बार बदले गए, लेकिन इन पारंपरिक आभूषणों की चमक कम नहीं हुई।
बर्डघाट रामलीला समिति 164 वर्षों से राम के आदर्शों को लीला के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा रही है। इस लंबी परंपरा में पुराने वस्त्राभूषणों का विशेष स्थान है। कपड़े पर सोने और चांदी के तारों से बुनाई कर तैयार किए गए मुकुट और कवच अपनी विशिष्ट बनावट के कारण गंगा-जमुनी कहलाते हैं।
मोती और मूंगे की मालाएं भी इसी विरासत का हिस्सा हैं। रामलीला के सामान्य मंचन में कलाकार अपने वस्त्राभूषण का प्रयोग करते हैं। रावण वध और राज्याभिषेक जैसे विशेष प्रसंगों में समिति के संरक्षित मुकुट और आभूषणों का उपयोग किया जाता है।
यही वह अवसर होता है, जब दशकों पुरानी धरोहर एक बार फिर मंच पर जीवंत हो उठती है। सोने-चांदी के तारों की कारीगरी, पारंपरिक मुखौटों और प्राचीन आभूषणों को सहेजकर रखने की यह परंपरा रामलीला की ऐतिहासिक पहचान को बनाए हुए है। ये वस्त्राभूषण केवल पात्रों की सजावट नहीं, बल्कि उन पीढ़ियों की याद भी हैं, जिन्होंने रामकथा को मंच पर जीवित रखने के लिए अपनी भूमिका निभाई।
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श्रीराम के मुकुट में नीलम-माणिक्य
भगवान श्रीराम का मुकुट सबसे अलग और आकर्षक है। इसमें नीलम और माणिक्य पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। रामलीला में रावण वध के बाद और राज्याभिषेक के दौरान भगवान श्रीराम को यही पारंपरिक मुकुट और आभूषण धारण कराए जाते हैं। लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, माता सीता और रावण सहित अन्य पात्र भी परंपरागत आभूषणों से सजते हैं।
सोने-चांदी के तारों से बुना है रावण का मुखौटा
रावण का 10 मुखों वाला मुखौटा सोने-चांदी के तारों से बुना गया है। वहीं, हनुमानजी और सुग्रीव के मुखौटे अष्टधातु से बने हैं। हनुमानजी की पीतल की गदा भी दशकों पुरानी है। इसके अलावा बाजूबंद, कंगन और युद्ध के दृश्यों में पहने जाने वाले सुरक्षा कवच रामलीला की पारंपरिक सज्जा को विशिष्ट बनाते हैं।
मुकुट, कवच व कुंडल काफी पुराने हो गए हैं। मरम्मत कराने का कई बार प्रयास किया गया, लेकिन अब इनके लिए कुशल कारीगर नहीं मिल रहे हैं। इसलिए उन्हें उसी रूप में संरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है।
- गणेश वर्मा, अध्यक्ष रामलीला समिति बर्डघाट
