सादात में नारी शक्ति का परचम: उच्च पदों पर महिलाएं, तारावती यादव की प्रेरणादायक कहानी
सादात क्षेत्र में महिलाएं विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होकर नारी सशक्तीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं। पति ...और पढ़ें

HighLights
सादात में महिलाएं संभाल रही हैं महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद।
थानाध्यक्ष तारावती यादव की कहानी संघर्ष और संकल्प की मिसाल।
पति की शहादत के बाद पुलिस में शामिल हुईं तारावती।
जागरण संवाददाता, गाजीपुर। नारी सशक्तीकरण अब केवल सरकारी योजनाओं और नारों तक सीमित नहीं है। महिलाएं जनप्रतिनिधि से लेकर प्रशासनिक और पुलिस विभाग के महत्वपूर्ण पदों पर अपनी क्षमता का परिचय दे रही हैं।
इसकी एक मिसाल सादात क्षेत्र में देखने को मिल रही है, जहां ब्लाक प्रमुख और नगर पालिका अध्यक्ष से लेकर खंड विकास अधिकारी, अधिशासी अधिकारी और थानाध्यक्ष तक की जिम्मेदारी महिलाएं संभाल रही हैं। विभिन्न विभागों में महिलाओं की यह भागीदारी पुरुष प्रधान समाज में उनकी बढ़ती भूमिका और आत्मनिर्भरता का संदेश दे रही है।
सादात ब्लाक की प्रमुख कवली देवी और नगर पालिका की चेयरमैन सुमन यादव हैं। गुरुवार को रितिका सिंह ने खंड विकास अधिकारी का कार्यभार ग्रहण किया। वहीं, नगर पंचायत के अधिशासी अधिकारी पद पर सोनल जैन, थानाध्यक्ष तारावती यादव, बाल विकास परियोजना अधिकारी सोनम सिंह और मनरेगा की एपीओ संगीता सिंह जिम्मेदारी निभा रही हैं।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बीपीएम सोनल श्रीवास्तव और ट्रेनी महिला चिकित्सक डॉ. काजल गौतम भी स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान दे रही हैं। एक ही क्षेत्र में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर महिलाओं की मौजूदगी युवतियों के लिए प्रेरणादायी है। खासकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहीं बेटियों को इससे आगे बढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने का हौसला मिलेगा।
पति की शहादत के बाद संघर्षों से हासिल की वर्दी
सादात की थानाध्यक्ष तारावती यादव की जीवन यात्रा संघर्ष और संकल्प की मिसाल है। मूल रूप से कौशांबी की रहने वाली तारावती की शादी वर्ष 1997 में एक किसान परिवार में हुई थी। उस समय वह हाईस्कूल पास थीं। उनके पति रामराज यादव वर्ष 2001 में पुलिस विभाग में उपनिरीक्षक बने और उन्होंने तारावती को आगे की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया।
इसी बीच अपराधियों से मुठभेड़ के दौरान पति बलिदान हो गए। उस समय उनके दो छोटे बच्चे थे। कम उम्र में पति को खोने के बाद रिश्तेदारों ने उन्हें दूसरा विवाह करने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने बच्चों की परवरिश और पति के सपनों को प्राथमिकता दी।
वर्ष 2011 में उन्होंने पुलिस की वर्दी पहनकर अपने संघर्ष को नई दिशा दी। पति की स्मृति से जुड़ी परंपराओं को भी वह आज तक निभा रही हैं। उनके संघर्ष की कहानी बताती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास से अपनी राह बनाई जा सकती है।
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