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यूपी के जिस मेडिकल कॉलेज का विधानसभा में हुआ बखान, उसी में इलाज के अभाव में जा रहीं मरीजों की जान

Published: Mon, 09 Mar 2026 02:48 PM (IST)

गाजीपुर के राजकीय मेडिकल कॉलेज में मरीजों की लगातार मौतें लापरवाही उजागर कर रही हैं। उपमुख्यमंत्री द्वारा विधानसभा में सराहे ...और पढ़ें

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जागरण संवाददाता, गाजीपुर। विधानसभा में जिस राजकीय मेडिकल कॉलेज के जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं का उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने खुले मंच से बखान किया था, वही अस्पताल अब मरीजों और उनके परिजनों के लिए पीड़ा और लापरवाही का पर्याय बनता जा रहा है। इलाज, दवाइयों और चिकित्सकीय निगरानी के अभाव में हो रही लगातार मौतों ने स्वास्थ्य तंत्र की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है।

हाल के दिनों में हुई दो मौतों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सरकारी अस्पतालों में मरीज इलाज कराने आते हैं या लापरवाही के भरोसे अपनी किस्मत छोड़ने।

राजकीय मेडिकल कॉलेज में रोजाना चार से पांच हजार मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं। दूर-दराज के गांवों से लोग बेहतर इलाज की उम्मीद में यहां आते हैं, लेकिन कई बार यही उम्मीद उनकी सबसे बड़ी मजबूरी बन जाती है।

आरोप है कि चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की लापरवाही के कारण मरीजों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता, जिसका खामियाजा उन्हें अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है। 26 फरवरी को दिलदारनगर के महना गांव निवासी सतीश अपने चार माह के बेटे को उल्टी, दस्त और बुखार की शिकायत पर करीब 30–35 किमी का सफर तय कर जिला अस्पताल लाए।

ओपीडी काउंटर से पर्ची लेने के बाद जब वह डॉक्टर को दिखाने पहुंचे तो उन्हें नंबर आने का इंतजार करने को कहा गया। डेढ़ घंटे तक मासूम तड़पता रहा, लेकिन किसी ने उसकी गंभीर हालत नहीं देखी। आखिरकार वह मां की गोद में ही दम तोड़ गया।

यह मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि पांच मार्च को शादियाबाद के खड़वाडीह निवासी मुकेश कुमार अपनी मां ऊषा को सीने में दर्द और सांस लेने में परेशानी की शिकायत पर महिला वार्ड में भर्ती कराए। आरोप है कि करीब चार घंटे तक महिला वार्ड में कोई समुचित उपचार नहीं मिला और तड़पते-तड़पते ऊषा की मौत हो गई।

परिजनों के हंगामे के बाद विभाग ने लापरवाही मानते हुए तीन कर्मचारियों को निलंबित कर दिया, जबकि मासूम की मौत के मामले में तीन सदस्यीय जांच कमेटी अभी जांच कर रही है। लगातार हो रही ऐसी घटनाएं कई सवाल खड़े कर रही हैं।

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