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42 साल बाद भी खोड़ा के 52000 मकानों को नहीं मिली पहचान, 26 लाख खर्च कर लगाए स्टीकर भी हुए बेकार

Published: Sat, 26 Sep 2026 06:45 AM (IST)

गाजियाबाद के खोड़ा में लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद मकानों को पहचान दिलाने की योजना विफल रही, क्योंकि दिए ...और पढ़ें

एआई जेनेरेटेड इमेज।

एआई जेनेरेटेड इमेज।

HighLights

  1. लाखों खर्च के बावजूद खोड़ा में मकानों की पहचान अधूरी।

  2. नगर पालिका द्वारा दिए गए नंबर स्टीकर जल्द खराब हुए।

  3. निवासियों को ऑनलाइन डिलीवरी और पता ढूंढने में परेशानी।

जितेंद्र सिंह, साहिबाबाद (गाजियाबाद)। खोड़ा में सालों बाद भी मकानों काे पहचान नहीं मिल सकी है। नगर पालिका परिषद ने इस योजना पर लाखों खर्च कर दिए। बावजूद इसके मकानों की पहचान गायब है। यहां की भूलभुलैया में आए दिन लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।

इस कारण निवासियों को आनलाइन डिलीवरी और अन्य सेवाओं में परेशानी हो रही है। नगर पालिका परिषद ने मकान स्वामियों को मकान नंबर प्लेट के स्थान पर स्टीकर थमा दिया। कुछ लोगों ने तो मकान पर नंबर स्टीकर लगा लिया तो वहीं काफी संख्या में लोगों ने इसे नहीं लगाया।

इसमें से कुछ लोगों ने जो नंबर स्टीकर लगाया वो खराब हो गया। स्टीकर पर लिखे नंंबर मिट गए हैं। मकान नंबर की पहचान गायब हो गई है। इससे नगर पालिका परिषद की खोड़ा में मकानों को पहचान दिलाने की योजना धरातल पर नहीं उतर सकी है।

कुछ ही दिन में खराब हो जा रही हैं स्टीकर

साथ ही गलियों को भी पहचान न मिलने से लोगों को रोजाना परेशानी का सामना करना पड़ता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि नगर पालिका से मिले नंबर स्टीकर किसी काम की नहीं है। ये लगाने के बाद कुछ दिन में ही खराब हो गए। स्थानीय लोगों ने नगर पालिका परिषद से नंबर प्लेट देने की मांग की है।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि मकानों पर नंबर न होने के कारण बाहर से आने वाले लोगों को काफी परेशानी होती है। उन्हे गंतव्य तक पहुंचने में जद्दोजहद करनी पड़ती है। कई बार पते तक पहुंचने के लिए बहुत चक्कर लगाने पड़ते हैं।

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डिलीवरी और कुरियर कंपनियों को भी डिलीवरी देने के दौरान परेशानी हाेती है। डिलीवरी ब्वाय और कुरियर कंपनियों के कर्मी जब मौके पर जाते हैं तो मकान नंबर न मिलने से जूझना पड़ता है। कई बार पता ढूंढने में काफी समय लग जाता है।

खोड़ा को बसे हुए करीब 42 साल हो गए हैं। यहां 1734 गलियां और 51652 मकान हैं। यहां करीब 12 लाख की आबादी है। मकानों पर नंबर न होने के कारण लोगों को परेशानी होती है।

लाखों खर्च कर भी समस्या बरकरार

मकानों को पहचान दिलाने के लिए नगर पालिका परिषद ने सर्वे कराया था। सर्वे करने के बाद नगर पालिका ने इसे 10 सेक्टर में बांटा और इनके आधार पर घरों पर नंबर स्टिकर लगाने की प्रक्रिया शुरु की।

नगर पालिका अधिकारी ने इस पर स्टिकर प्रिंट करने, चिपकाने और डिजिटली फीड करने पर करीब 25 से 26 लाख रुपये खर्च किया जाना बताया। लोगों ने स्टीकर मकानों पर नहीं लगाए। इससे नगर पालिका की मकानों को पहचान दिलाने की योजना धरातल पर नहीं उतर सकी।

राजस्व रिकार्ड में मकान नंबर नहीं किए गए दर्ज

स्थानीय निवासियों का कहना है कि नगर पालिका ने मकान नंबर तो दे दिए लेकिन इसे राजस्व रिकार्ड में दर्ज नहीं किया गया है। इससे इन नंबरों की कोई उपयोगिता नहीं है।

मकानों को नंबर देने की कई बार प्रक्रिया की जा चुकी है। बावजूद इसके अभी भी मकानों को पता नहीं मिल सका है। नगर पालिका परिषद ने नंबर तो दे दिए, लेकिन इनकी गूगल मैपिंग न किए जाने से इनका कोई फायदा नहीं है। मकानों को ढूढना अब भी बहुत मुश्किल है।

- दीपक जोशी, अध्यक्ष खोड़ा रेजीडेंट एसोसिएशन

पहले मकानों के लिए नंबर प्लेट दी गई। फिर सर्वे कर नंबर बदलकर नंबर स्टीकर दिए गए। इस पर नगर पालिका ने लाखों रुपये खर्च कर दिए। अभी भी काफी संख्या में लागों को नंबर स्टीकर तक नहीं मिले हैं।

नगर पालिका ने इन नंबरों को राजस्व रिकार्ड में भी दर्ज नहीं किए गए हैं। इससे इन नंबरों का कोई लाभ नहीं है।

- सतीश कुमार गुप्ता, सभासद दल के नेता

मकानों की नंबरिंग प्रक्रिया पूरी हो गई है। मकान स्वामियों को नगर पालिका परिषद की ओर से मकान नंबर के स्टीकर दिए जा चुके हैं।

- शैलेंद्र सिंह, अधिशासी अधिकारी

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