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डिजिटल दौर में 'ठहराव' जरूरी, तकनीक सोचने की क्षमता पर हावी न हो; बच्चों में विकसित करें डिजिटल विवेक

Published: Tue, 01 Sep 2026 11:26 PM (IST)

डिजिटल युग में लगातार कंटेंट के प्रवाह से ठहरकर सोचने और आत्मचिंतन की क्षमता कमजोर हो रही है, खासकर बच्चों ...और पढ़ें

एआई जेनेरेटेड इमेज।

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HighLights

  1. डिजिटल युग में आत्मचिंतन और धैर्य की क्षमता घट रही है।

  2. बच्चों में एकाग्रता और स्वतंत्र सोच का विकास प्रभावित हो रहा।

  3. स्कूलों को डिजिटल विवेक और ठहराव सिखाना आवश्यक है।

जागरण संवाददाता, साहिबाबाद (गाजियाबाद)। ठहराव केवल रुक जाने का नाम नहीं है, बल्कि यह स्वयं को समझने, विचार करने और सही निर्णय लेने की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।

किसी भी कार्य या प्रतिक्रिया से पहले कुछ क्षण रुककर सोचना हमें स्वयं प्रतिक्रिया देने के बजाय विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सहायता करता है। वास्तव में, ठहराव हमारे जीवन में आत्मचिंतन, धैर्य और संतुलन का अवसर प्रदान करता है।

भारतीय संस्कृति में सदियों से मनन, चिंतन, आत्मसंयम और धैर्य को विशेष महत्व दिया गया है। हमारी शिक्षा परंपरा भी बच्चों के समग्र विकास पर बल देती रही है। यही भावना राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भी दिखाई देती है।

इसमें बच्चों के बौद्धिक, भावनात्मक, सामाजिक, नैतिक और शारीरिक विकास को शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य माना गया है, लेकिन आज का डिजिटल युग हमारे जीवन की गति को निरंतर बढ़ा रहा है।

डिजिटल उपकरणों, सोशल मीडिया और आनलाइन प्लेटफार्म ने ज्ञान और संचार को अत्यंत सरल बनाया है, परंतु इसके साथ हमारी एक महत्वपूर्ण क्षमता ठहरकर सोचने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।

डिजिटल दुनिया का अनंत और निरंतर बहता हुआ कंटेंट हमारे ध्यान को लगातार एक विषय से दूसरे विषय की ओर ले जाता है। एक वीडियो समाप्त होते ही दूसरा सामने आ जाता है और एक सूचना पढ़ते ही दूसरी हमारा ध्यान आकर्षित करने लगती है।

परिणामस्वरूप हमारे पास सोचने और आत्ममंथन करने का समय कम होता जा रहा है। इसका प्रभाव बच्चों पर विशेष रूप से दिखाई देता है। आज बच्चे बहुत कम उम्र में मोबाइल, गेमिंग, इंटरनेट मीडिया और विभिन्न डिजिटल प्लेटफार्म से जुड़ रहे हैं।

लगातार डिजिटल उत्तेजना के कारण उनके लिए धैर्यपूर्वक किसी विषय पर ध्यान केंद्रित करना, प्रतीक्षा करना और स्वयं उत्तर खोजने का प्रयास करना कठिन हो सकता है।

हर प्रश्न का उत्तर तुरंत गुगल या एआइ टूल्स से प्राप्त हो जाना सुविधाजनक है, लेकिन यदि तकनीक हमारे सोचने के स्थान पर सोचने लगे, तो सीखने की वास्तविक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। विद्यालयों की भूमिका आज और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

हमें बच्चों को डिजिटल रूप से सक्षम बनाने के साथ-साथ डिजिटल रूप से विवेकशील भी बनाना होगा। उन्हें सिखाना होगा कि हर सूचना पर तुरंत प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं है।

कभी-कभी स्क्रीन से दूर हटकर शांत बैठना, पुस्तक पढ़ना, प्रकृति को देखना, बातचीत करना और अपने विचारों को सुनना भी सीखने का हिस्सा है। छोटी-छोटी गतिविधियां बच्चों में ठहराव और चिंतन की आदत विकसित कर सकती हैं।

डिजिटल दुनिया से दूर होना समाधान नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हम डिजिटल जीवन के बीच ठहराव के लिए स्थान बनाएं। तकनीक हमारे हाथ में साधन रहे, हमारी सोच को नियंत्रित करने वाली शक्ति नहीं। ठहराव निष्क्रियता नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण विचार और सही निर्णय की शुरुआत है।

-रेनू श्रीवास्तव, प्रधानाचार्य, सेंट टेरेसा स्कूल, इंदिरापुरम

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डिजिटल तकनीकी का सही उपयोग केवल उपभोगकर्ता पर निर्भर है। एक विद्यार्थी चाहे तो इसका उपयोग कर आइआइटी और नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं को आसानी से पास कर सकता है। अगर वो चाहे तो बुरी आदतों में फंसकर अपना भविष्य बर्बाद कर सकता है।

-अंश अरोड़ा, कक्षा-11वीं।

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वर्तमान के तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ता जा रहा है। उपकरणों का हर छोटी चीज में उपयोग मनुष्य को उसके पारिवारिक संबंधों से वंचित करता जा रहा है। हमें तकनीकी और संबंधों में अंतर करने के लिए विवेक विकसित करना चाहिए।

-कृतिका, कक्षा-10

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तकनीकी का प्रयोग हम सभी उपकरणों में करते हैं। तकनीकी हमारे लिए केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि बाधा भी बन है। कोई नहीं जानता था कि हम इसका प्रयोग करके अपने पारिवारिक संबंधों में भी दूरियां पैदा कर देंगे।

-युविका कलरा, कक्षा-10

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हर दिन तकनीकी रूप से विकसित हो रही इस दुनिया में हम विवेक जिम्मेदारी और ईमानदारी जैसे भावों को भूलते चले जा रहे हैं। हम अपने ही परिवार से विमुख हो रहे हैं। तकनीकी और प्राकृतिक दुनिया के बीच अंतर स्थापित करने के लिए भी हमारे अंदर डिजिटल विवेक होनी चाहिए।

-समृद्धि अग्रवाल, कक्षा-10

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डिजिटल दुनिया बढ़ते समय के साथ हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है। पैसों की लेन-देन से लेकर बड़ी तकनीक तक सब कुछ डिजिटल हो रहा है। हमारे विवेक का बढ़ना भी उतना भी जरूरी है जितना की तकनीकी का विकास।

-अवनी सिंह, कक्षा-10

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अगर हम एम्स की रिपोर्ट को माने तो बचपन से ही बच्चों को बोलने और लिखने में दिक्कतें आ रही है। यह सब अत्यधिक तकनीकी के प्रयोग के कारण हो रहा है। हम तकनीकी का उतना ही प्रयोग करें जिसमें हमारा विवेक प्रभावित न हो।

-सचित चौबे, कक्षा-10

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