महानगरों के खौफनाक आंकड़े... जलवायु परिवर्तन खामोशी से छीन रहा है आपकी नींद, दिल्लीवालों के लिए रेड अलर्ट
दिल्ली में बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण लोग सालाना औसतन 66.8 घंटे की नींद खो रहे हैं, जिससे ...और पढ़ें

दिल्ली में बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण लोग सालाना औसतन 66.8 घंटे की नींद खो रहे हैं। इमेज एआई
HighLights
दिल्ली में सालाना 66.8 घंटे की नींद कम हो रही है।
'अर्बन हीट आइलैंड' प्रभाव नींद घटने का प्रमुख कारण।
कमजोर वर्ग, बुजुर्ग और महिलाएं सबसे अधिक प्रभावित।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। देश की राजधानी में रहने वाले लोगों की सेहत पर अब मौसम की सीधी मार पड़ने लगी है। एक हालिया रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण दिल्ली का हर नागरिक सालाना औसतन 66.8 घंटे की नींद खो रहा है। इसमें से पांच घंटे की नींद सीधे तौर पर क्लाइमेट चेंज के कारण बढ़े तापमान की वजह से कम हुई है।
यूं तो देश के अन्य बड़े महानगरों की तुलना में दिल्ली में नींद का यह नुकसान सबसे कम दर्ज किया गया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि साल भर में करीब 67 घंटे की नींद कम होना दिल्लीवालों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा रेड सिग्नल है।
दिल्ली में नींद उड़ने की बड़ी वजह: 'अर्बन हीट आइलैंड'
दिल्ली जैसी घनी आबादी वाले महानगरों में कंक्रीट के ढांचे, गाड़ियों का धुआं और हरियाली की कमी मिलकर 'अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट' पैदा करते हैं।

इसके कारण सूरज ढलने के बाद भी कंक्रीट की इमारतें और सड़कें गर्मी को रोके रखती हैं, जिससे रात का तापमान सामान्य से काफी अधिक बना रहता है। दिल्ली में गर्मी के कारण होने वाले कुल स्लीप लास में से 7% हिस्सा सीधे तौर पर ग्लोबल वॉर्मिंग और क्लाइमेट चेंज का नतीजा है।
देश के अन्य महानगरों से तुलना: कहां कितनी उड़ रही है नींद?
भले ही दिल्ली इस सूची में सबसे नीचे है, लेकिन चेन्नई और मुंबई जैसे तटीय शहरों में उमस और गर्मी ने रातों की नींद पूरी तरह हराम कर रखी है। देश के प्रमुख शहरों में गर्मी से उड़ती नींद (सालाना आंकड़े)
| शहर | कुल गायब हुई नींद | जलवायु परिवर्तन का असर |
|---|---|---|
| चेन्नई | 93 घंटे | 5 घंटे |
| मुंबई | 84 घंटे | 5 घंटे |
| कोलकाता | 80 घंटे | 5 घंटे |
| अहमदाबाद | 78 घंटे | 6 घंटे |
| हैदराबाद | 75 घंटे | 7 घंटे |
| बेंगलुरु | 67 घंटे | 8 घंटे (सबसे ज़्यादा असर) |
| दिल्ली | 66 घंटे (सबसे कम नुकसान) | 5 घंटे |
| पुणे | 65 घंटे | 6 घंटे |
- सबसे बुरा हाल : चेन्नई के लोगों का है, जहां हर व्यक्ति साल में 93 घंटे की नींद खो रहा है।
- दिल्ली की स्थिति : दिल्ली इस सूची में सबसे नीचे है, लेकिन यहां भी लोग हर साल करीब 66 घंटे कम सो पा रहे हैं, जिसमें से 5 घंटे का नुकसान सीधे तौर
- बेंगलुरु भले ही ठंडे मौसम के लिए जाना जाता है, लेकिन वहां क्लाइमेट चेंज का असर (12%) सबसे खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।
सेहत पर पड़ रहा है भारी असर
डॉक्टरों और शोधकर्ताओं के अनुसार, नींद की यह लगातार हो रही कमी कोई आम बात नहीं है। इसके कारण लोगों में कई गंभीर बीमारियां पनप रही हैं:
- मानसिक तनाव और चिड़चिड़ापन: नींद पूरी न होने से मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ता है और अवसाद का खतरा बढ़ता है।
- गंभीर बीमारियां : कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता, दिल से जुड़ी बीमारियां और याददाश्त में कमी।
- काम की उत्पादकता में भारी गिरावट: दिनभर थकान रहने के कारण लोगों की कार्यक्षमता और डिसीजन मेकिंग प्रभावित हो रही है।
गरीब और बुजुर्गों पर सबसे ज्यादा मार
इस मौसमी बदलाव की सबसे बड़ी मार समाज के सबसे कमजोर वर्ग पर पड़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार बुजुर्ग और महिलाएं तापमान में होने वाले इस बदलाव के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं। कम आय वाले परिवार जो तंग बस्तियों में रहते हैं और जिनके पास घरों को ठंडा रखने के लिए कूलर या एसी जैसी सुविधाएं नहीं हैं, वे इस स्लीप लॉस का सबसे पहला और बड़ा शिकार बन रहे हैं।
