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यूपी में किसानों के खिले चेहरे: कम लागत में ज्यादा मुनाफा, सिंघाड़ा की मिठास से बढ़ेगी किसानों की आय

Published: Sat, 24 Oct 2026 02:56 PM (IST)

औसत बारिश के कारण जलेसर क्षेत्र के सिंघाड़ा उत्पादक किसानों में खुशी है। लगभग 1200 हेक्टेयर में हो रही सिंघाड़े ...और पढ़ें

सिंघाड़ा की खेती।

सिंघाड़ा की खेती।

HighLights

  1. औसत बारिश से सिंघाड़ा उत्पादक किसानों के चेहरे खिले।

  2. जलेसर में 1200 हेक्टेयर पर सिंघाड़े की खेती।

  3. दिल्ली, आगरा सहित कई शहरों में पहुंच रहा सिंघाड़ा।

जागरण संवाददाता, एटा। इस बार औसत बारिश ने जलेसर क्षेत्र के सिंघाड़ा उत्पादक किसानों के चेहरों पर मुस्कान लौटा दी हैं। जलेसर और अवागढ़ क्षेत्र के करीब पांच दर्जन गांवों में लगभग 1200 हेक्टेयर में सिंघाड़े की खेती हो रही हैं। फसल बाजार में पहुंचने लगी हैं। अक्टूबर की शुरुआत से ही जलेसर क्षेत्र का सिंघाड़ा एटा-कासगंज के अलावा दिल्ली, आगरा, जयपुर, इंदौर, चंडीगढ़ और गुड़गांव की मंडियों में भी यहां का सिंघाड़ा भेजा जा रहा हैं। 
करीब तीन दशक पहले मल्लाह समुदाय के लोगों ने तालाबों और गड्ढों से इस खेती की शुरुआत की थी। अब यह क्षेत्र के किसानों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन बन गई हैं। पिछले दो दशक से खेतों में भी सिंघाड़े का उत्पादन व्यापक स्तर पर हो रहा हैं। इस साल भी सिंघाड़े की फसल के लिए जरूरत से भी अधिक बारिश होने की स्थिति में अच्छा उत्पादन माना जा रहा हैं।

इन गांवों में मीठे सिंघाड़े का उत्पादन

जलेसर तहसील क्षेत्र के गांव पिलखतरा, मीसाकलां, मीसा खुर्द, पुन्हेरा,खेरिया ताज, खेरिया, सुर्जी, पौंडरी, नरोरा, नगला छैया, नूंहखास, कसबा, नूंहखेड़ा, नगला बख्ती, नगला केसरी, नगला वसु, लालगढ़ी, हदीदादपुर, नगला चांद, खेड़िया खाती, अब्दुल हईपुर, पिलखतरा, खेड़िया, उल्लदापुर, बलसेरा, नरहुली, बढ़ावली, रेजुआ, नगला चंदन, नगला गोपाल, बलीदादपुर, मंडनपुर, मकसूदपुर, खुशरई और अभय राजपुर सहित कई गांवों में सिंघाड़े की खेती की जा रही हैं। सभी क्षेत्र मीठे सिंघाड़े के हैं।

यह प्रजातियां हैं खास

एटा जिले में सिंघाड़े की पारंपरिक लाल और हरी कांटेदार प्रजातियां सबसे ज्यादा प्रचलित हैं। यह प्रजाति ट्रैपा नैटन्स या ट्रैपा बिसपिनोसा के अंतर्गत आती हैं। अच्छे उत्पादन के साथ मिठास बेहतर होता हैं।

लागत भी कम और उत्पादन ज्यादा

सिंघाड़ा उत्पादन में प्रति हेक्टेयर 6000 से का खर्चा आता हैं। इसके एवज में 20 से 25 कुंतल प्रति हेक्टेयर की फसल मिलती हैं। सबसे ज्यादा खर्चा मजदूरी और परिवहन में खर्च होता हैं।

हरे सिंघाड़े पर ही ज्यादा फोकस

पिछले साल 1400 से 2200 रुपए कुंतल तक के भाव मिले और इस बार अक्टूबर की शुरुआत से सिंघाड़ा 2200 से 2900 रुपए तक बिका हैं। जैसे-जैसे फसल बढ़ेगी मूल्य भी कम होंगे।

पोषक तत्वों से भरपूर हैं सिंघाड़ा

वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. राहुल यादव बताते हैं कि सिंघाड़ा स्वाद के साथ सेहत के लिए खास हैं। इसमें कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, पोटैशियम और कुछ मात्रा में विटामिन एवं खनिज पाए जाते हैं। शरीर को ऊर्जा, पाचन में मददगार, हृदय स्वास्थ्य के लिए उपयोगी, ग्लूटेन-मुक्त, वजन नियंत्रित रखने में सहायक होने के अलावा मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र के लिए उपयोगी हैं। दूषित जल में उगे सिंघाड़े को बिना उचित सफाई और सुरक्षित तैयारी के नहीं खाना चाहिए।

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10 साल से खेती कर रहे हैं, अच्छे उत्पादन के बावजूद उतना लाभ नहीं मिल पाता क्योंकि काफी खर्चा फसल के परिवहन में हो जाता हैं।

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पवन ठाकुर, किसान

जिले की मुख्य फसल सिंघाड़ा होने के बावजूद भी बीज, खाद और अन्य कृषि संसाधनों पर सहायता मिले तो खेती का दायरा बढ़ सकता हैं।

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रामेश्वर दिवाकर, किसान