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देवरिया में 19 लाख खर्च, फिर भी 9 साल से अधूरे पड़े हैं 23 गरीबों के आशियाने

Published: Fri, 30 Oct 2026 11:32 AM (IST)

देवरिया के बनकटा में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत 23 घर 9 साल बाद भी अधूरे हैं, जबकि ...और पढ़ें

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण

HighLights

  1. बनकटा में 23 आवास 9 साल से अधूरे, 19 लाख रुपये खर्च।

  2. जमीन विवाद या अनुपलब्धता अधूरे निर्माण के मुख्य कारण।

  3. योजना की निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठे।

पुरुषोत्तम पाण्डेय, बनकटा, (देवरिया)। गरीबों को पक्की छत मुहैया कराने के लिए संचालित प्रधानमंत्री आवास योजना और मुख्यमंत्री आवास योजना की जमीनी हकीकत सवाल खड़े कर रही है। वर्ष 2016-17 से अब तक क्षेत्र के 23 लाभार्थियों के खातों में आवास निर्माण के नाम पर करीब 19 लाख रुपये भेजे जा चुके हैं, लेकिन इन लाभार्थियों के घर अब तक नहीं बन सके हैं।

सवाल यह है कि सरकारी धनराशि मिलने के बावजूद आवास निर्माण क्यों नहीं पूरा हुआ? क्या लाभार्थियों को पात्रता के समय जमीन की उपलब्धता की जांच किए बिना योजना का लाभ दे दिया गया, या फिर आवास निर्माण की निगरानी में ही लापरवाही बरती गई? गरीबों को छत देने की मंशा से शुरू हुई योजना में वर्षों बाद भी आवास अधूरे रहना व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।विभागीय स्तर पर आवास निर्माण पूरा नहीं होने के पीछे अलग-अलग कारण बताए जा रहे हैं।

अधिकारियों का कहना है कि कुछ लाभार्थियों के यहां जमीन को लेकर विवाद है, जबकि कुछ के पास आवास बनाने के लिए अपनी जमीन ही उपलब्ध नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब जमीन की अनुपलब्धता या विवाद निर्माण में बाधा बन रहा था, तो इन मामलों के समाधान के लिए अब तक क्या प्रयास किए गए? लाभार्थियों को धनराशि जारी करने से पहले जमीन की स्थिति का सत्यापन किस स्तर पर किया गया था? यदि आवास निर्माण की राह में पहले से ही बाधाएं थीं, तो उनका समय रहते निराकरण क्यों नहीं कराया गया?

नौ साल में भी नहीं मिली पक्की छत

प्रधानमंत्री आवास योजना और मुख्यमंत्री आवास योजना का उद्देश्य पात्र गरीब परिवारों को पक्का आवास उपलब्ध कराना है। इसके तहत लाभार्थियों को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किस्तों में धनराशि दी जाती है। लेकिन बनकटा क्षेत्र में 23 लाभार्थियों के आवास अब तक पूरे नहीं होने का मामला योजना की निगरानी और क्रियान्वयन की पड़ताल की जरूरत बताता है।

हालांकि सभी लाभार्थियों को धनराशि किस अवधि में और कितनी-कितनी किस्तों में दी गई, इसका विस्तृत ब्योरा सामने आना बाकी है। ऐसे में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कितने आवास वास्तव में अधूरे हैं और कितने मामलों में निर्माण शुरू ही नहीं हुआ।

जांच और जवाबदेही तय करना जरूरी

मामले में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित लाभार्थियों को कितनी धनराशि दी गई, निर्माण किस स्तर पर रुका है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है। क्या संबंधित कर्मचारियों ने समय-समय पर स्थलीय सत्यापन किया? क्या लाभार्थियों को जमीन संबंधी समस्या दूर करने में विभागीय सहायता दी गई? क्या धनराशि जारी होने के बाद निर्माण की प्रगति की नियमित समीक्षा हुई? यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, जमीन के अभाव या विवाद से जूझ रहे पात्र लाभार्थियों की समस्या का समाधान कर आवास निर्माण पूरा कराने के लिए भी ठोस पहल जरूरी है।

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सवाल यह है कि गरीबों को पक्की छत देने के लिए जारी करीब 19 लाख रुपये के बाद भी 23 परिवारों के आवास अधूरे क्यों हैं? केवल जमीन के विवाद या अनुपलब्धता का हवाला देना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि विभाग प्रत्येक मामले की स्थिति सार्वजनिक करे, निर्माण में बाधा दूर करने की समयसीमा तय करे और यह सुनिश्चित करे कि सरकारी योजना का वास्तविक लाभ पात्र परिवारों तक पहुंचे।

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'कुछ लाभार्थियों के खाते में पैसा गया है जिनके यहां कुछ न कुछ विवाद व जमीन की दिक्कत के कारण आवास का निर्माण नही हो पाया है इसके समाधान का रास्ता निकाला जा रहा है'

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-अरुण पाण्डेय, बीडीओ,बनकटा