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चकिया में कुख्यात नक्सली की गिरफ्तारी से चौके थे लोग, अब बनारस में बृजेश गंजू के मारे जाने के बाद नक्‍सलवाद की यादें ताजा

By Rakesh SrivastavaEdited By: Abhishek sharma
Published: Sun, 20 Sep 2026 12:06 PM (IST)

वाराणसी में 25 लाख के इनामी नक्सली बृजेश गंजू के एटीएस मुठभेड़ में मारे जाने से चंदौली में कुख्यात नक्सली ...और पढ़ें

वाराणसी में बृजेश गंजू के मारे जाने से चंदौली में नक्सली की गिरफ्तारी और यूपी में नक्सलवाद का इतिहास फिर चर्चा में।

वाराणसी में बृजेश गंजू के मारे जाने से चंदौली में नक्सली की गिरफ्तारी और यूपी में नक्सलवाद का इतिहास फिर चर्चा में।

HighLights

  1. वाराणसी में 25 लाख इनामी नक्सली बृजेश गंजू एटीएस मुठभेड़ में मारा गया।

  2. चंदौली में कुख्यात नक्सली मुन्ना की गिरफ्तारी से पुरानी यादें ताजा हुईं।

  3. नक्सलियों ने जंगल की जमीन विवाद में आदिवासियों का समर्थन हासिल किया।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। झारखंड के चतरा जनपद अंतर्गत लवलंग निवासी 25 लाख रुपये के इनामी बृजेश गंजू उर्फ गोपाल सिंह की वाराणसी के रामनगर में एटीएस से हुई मुठभेड़ में मारे जाने की घटना के बाद चंदौली में नक्सलियों के एरिया कमांडर की गिरफ्तारी और 2004 में पीएसी जवानों की गाड़ी को ब्लास्ट कर उड़ाने और कई जवानों की जान लेने की घटना की याद फिर से ताजा हो गई।

इसलिए कि उस समय नक्सली जंगल में ठौर बनाने के साथ ही जना सामान्य के बीच भी अपनी सोच का प्रचार-प्रसार करने लगे थे। उन दिनों मुन्ना एक राजनीतिक दल से जुड़ा था। चंदौली जिले की चकिया तहसील में एर‍िया कमांडर की पैठ प्रतिष्ठित लोगों संग मीडिया में भी खूब रही। उसी समय पुलिस ने मुन्‍नू की गिरफ्तारी कुख्यात एरिया कमांडर के रूप में की थी।

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इस बात की जानकारी हुई तो लोग कांप उठे। उन्हें सहसा विश्वास नहीं हो रहा था, कि उनके बीच भी कुख्यात नक्सली इस तरह पैठ बनाए जा रहा था। हालांकि, इस सच्चाई के बाद लोग कुछ खास तबके के लोगों से लोगों ने दूरी बनानी शुरू कर दी थी।इसलिए कि लोगों को भय था कि नक्सली उनके संपकों के जरिए किसी को फिरौती के लिए अगवा न कर लें।

मुखबिरी के शक में मारे गए थे कई वनकर्मी
नक्सली उन दिनों वनकर्मियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते थे। इसलिए कि वनकर्मी जंगल काटने वालों की निगरानी करते थे, जो उन दिनों नक्सलियों के लिए मुफीद घर था। उन दिनों छोटी-छोटी घटनाएं भी शुरू हो गईं थीं। इसलिए पुलिस भी नक्सलियों के पीछे सक्रिय हुई तो वनकर्मी भी नक्सलियों के निशाने पर आ गए। मुखबिरी करने के शक में कई वनकर्मी उन दिनों मारे गए थे।

जंगल के जमीन की लड़ाई ने नक्सलियों को मिलता था खाद पानी
जंगल की जमीन को आदिवासी समाज के लोग अपने जीविका के लिए खेती योग्य बनाते थे। जिसे दबंग लोग हथिया लेते थे, इसे ही नक्सलियों तब हथियार बनाया था। आदिवासियों की मदद के लिए आगे आए तो दबंग पीछे हटे। ऐसे में नक्सलियों को रहनुमा समझ आदिवासी समाज के लोग नक्सलियों को ठिकाना देने लगे।

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