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तीन दोस्तों की कंपनी ने बनाया बॉयोपैलट, युद्ध के दौर में दुनिया में बन रहा ईंधन का विकल्प; किसानों की भी बल्ले-बल्ले

By Ajeet Chaudhary Edited By: Praveen Vashishtha
Published: Wed, 18 Mar 2026 02:56 PM (IST)

Bijnor News : बिजनौर में तीन दोस्तों की कंपनी किसानों के खेतों से पराली आदि फसल अवशेष खरीदकर उसे बायो ...और पढ़ें

बिजनौर में फसल अवशेष से बायो पैलेट बनाने वाली फैक्ट्री में तीनों दोस्त। इंसेट में यहां बनाए गए बायो पैलेट।

बिजनौर में फसल अवशेष से बायो पैलेट बनाने वाली फैक्ट्री में तीनों दोस्त। इंसेट में यहां बनाए गए बायो पैलेट।

HighLights

  1. बिजनौर में तीन दोस्तों ने फसल अवशेष से बनाया ईंधन।

  2. इसकी भारत के साथ पोलैंड, जर्मनी व डेनमार्क में भी बिक्री।

अजीत चौधरी, बिजनौर। जिले के किसान फसल अवशेष को जलाने के बजाय गलाकर खाद बना रहे हैं। जिन किसानों के पास फसल अवशेष गलाने का समय व साधन नहीं है, उन्हें तीन दोस्तों की कंपनी सहयोग के साथ अतिरिक्त कमाई भी करा रही है। इससे वे बहुत खुश हैं। कंपनी के कर्मचारी किसानों के खेतों से ही फसल अवशेष उठवा रहे हैं और उनसे बायो पैलेट बना रहे हैं। 

कोयले से भी अधिक ताप वाला होता है बायो पैलेट 

बायो पैलेट एक प्रकार का ईंधन होता है जो कोयले से भी अधिक ताप वाला लेकिन बिना प्रदूषण वाला होता है। उनके बनाए बायो पैलेट भारत के अलावा डेनमार्क और जर्मनी तक में बिक रहे हैं। बायो पैलेट पराली की समस्या से उबरने के लिए एक माध्यम बनने के साथ ईरान-इजराइल युद्ध के चलते खड़े हुए ईंधन संकट में बेहतर विकल्प भी बन रहा है।

कोयले के विकल्प के रूप में कर रहे बिक्री  

गांव मंडावली निवासी इंजीनियर अनूप सिंह व पुलकित सिंह और वन मंत्रालय में विज्ञानी रहे अंकित कुमार ने तीन वर्ष पूर्व फसल अवशेष से बायो पैलेट बनाने वाली फैक्ट्री लगाई। उन्होंने खेत से पराली, पत्ती व अन्य फसल अवशेष किसानों से खरीदे व उनसे पैलेट बनाए। पैलेट को कोयले के विकल्प के रूप में बिजली बनाने वाली फैक्ट्री व अन्य कंपनी को बेचा।

किसानों से खरीद रहे फसल अवशेष

कर्मचारी किसान के खेत से ही एक से डेढ़ रुपये प्रति किलोग्राम की दर से फसल अवशेष खरीदते हैं। उन्होंने शुरुआत के दो वर्ष में पांच हजार मीट्रिक टन फसल अवशेष से पैलेट बनाए। इस बार केवल एक ही वर्ष में खेतों से पांच हजार मीट्रिक टन फसल अवशेष उठाए हैं।

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उनके बनाए पैलेट डेनमार्क और जर्मनी तक जा रहे हैं। कंपनी संचालक बताते हैं कि पिछले साल उनका टर्नओवर 5.50 करोड़ से अधिक रहा। इसके अलावा कंपनी प्रत्यक्ष रूप से 25 और परोक्ष रूप से 60 लोगों को रोजगार भी उपलब्ध करा रही है। उन्होंने बताया कि कोयले से 14 से 16 प्रतिशत राख बनती है, जबकि बायोपैलेट में दो प्रतिशत से भी कम राख बनती है।

गैस भी बन जाती है ईंधन

बायोपैलेट फैक्ट्री के बायलर में जलता है। इसके जलने पर वहां भी गैस निकलती है लेकिन बायलर के अंदर ही ईंधन के रूप में प्रयोग कर जला ली जाती हैं। पर्यावरण में बिल्कुल नहीं आ पाती है जबकि खुले में फसल अवशेष जलने पर यह पर्यावरण प्रदूषण का कारण बनता है।

बनाए तीन हजार मीट्रिक टन बायोपैलेट

खेतों से पत्ती उठाकर उसे क्यूब के रूप में बांध दिया जाता है। इसे मशीनों से कंप्रेस कर बायो पैलेट बनाया जाता है। ठोस होने के कारण यह अधिक ताप से जलती है। बायो पैलेट फैक्ट्रियों में कोयले के विकल्प के रूप में प्रयोग होती है। वे अब तक लगभग दस हजार मीट्रिक टन फसल अवशेष से बायो पैलेट बना चुके हैं।

एक टन फसल अवशेष से निकलने वाली गैस

  • 1,460 किलोग्राम कार्बन डाइ आक्साइड
  • 06 किलोग्राम कार्बन मोनो आक्साइड
  • 03 किलोग्राम पार्टिकुलेट मैटर
  • 02 किलोग्राम सल्फर डाई आक्साइड
  • 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन
  • 2.3 किलोग्राम फास्फोरस
  • 25 किलोग्राम पोटैशियम

नोट: इसके अलावा गन्ने की पत्ती जलाने से सिलिका गैस निकलती है जो फेफड़ों के लिए बहुत नुकसानदायक होता है।

इन्होंने कहा...

किसानों को फसल अवशेष से खाद बनाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया जा सकता है तो वे खेत से फसल अवशेष उठवा दें। खेत में फसल अवशेष जलाने से भी मिट्टी की ऊपरी परत खराब होती है।

डा. घनश्याम वर्मा, उपनिदेशक कृषि

फसल अवशेष से बायो पैलेट बनाकर पर्यावरण संरक्षण और किसान की आय बढ़ाना दोनों ही काम किए जा रहे हैं। साथ ही लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। युवाओं को स्वरोजगार से जुड़ने को प्रेरित किया जा रहा है।

रणविजय सिंह, सीडीओ