बस्ती में गूंजी थी महात्मा गांधी जी की आवाज, लोगों में जगाया था स्वाधीनता का जज्बा
महात्मा गांधी 1921 और 1929 में बस्ती आए थे, जहाँ उन्होंने हथियागढ़ रेहार मैदान में जनसभाओं को संबोधित कर लोगों ...और पढ़ें

गांधी जयंती पर विशेष।
HighLights
गांधी जी 1921 और 1929 में बस्ती आए थे।
हथियागढ़ रेहार मैदान में जनसभाओं को संबोधित किया।
असहयोग आंदोलन और स्वदेशी का संदेश दिया।
महेंद्र कुमार त्रिपाठी, बस्ती। बस्ती की धरती भी स्वतंत्रता आंदोलन की उन गौरवशाली स्मृतियों को अपने भीतर समेटे है, जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ देशभर में आजादी की चेतना आकार ले रही थी। इसी दौर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 8 अक्टूबर 1921 को बस्ती पहुंचे थे। उन्होंने हथियागढ़ रेहार के मैदान में जनसभा को संबोधित कर लोगों से स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने का आह्वान किया था।
गांधी जी के बस्ती पहुंचने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। उस समय अंग्रेजी शासन स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों पर कड़ी नजर रख रहा था। स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों और कांग्रेस नेताओं की गतिविधियों को रोकने के प्रयास किए जा रहे थे। ऐसे समय में बैरिस्टर ठाकुर अंशुमान सिंह गांधी जी को अपनी कार से बस्ती लेकर आए। वह पहले गोरखपुर पहुंचे और वहां से गांधी जी को लेकर खलीलाबाद ( संत कबीर नगर) होते हुए बस्ती आए।
हथियागढ़ रेहार का मैदान बना ऐतिहासिक मंच
हथियागढ़ में गांधी जी की सभा की खबर आसपास के क्षेत्रों में तेजी से पहुंची। बड़ी संख्या में लोग उन्हें सुनने के लिए जुटे। गांधी जी और ठाकुर अंशुमान सिंह के सभा स्थल पर पहुंचते ही लोगों ने भारत माता की जय के नारे लगाए। उस समय असहयोग आंदोलन अपने विस्तार के दौर में था और गांधी जी देशवासियों को अहिंसा, स्वदेशी तथा अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असहयोग के लिए प्रेरित कर रहे थे।
सभा के बाद गांधी जी ठाकुर अंशुमान सिंह की कोठी पर भी गए। गजेटियर में उपलब्ध विवरण के मुताबिक रोडवेज के निकट स्थित यह कोठी वर्ष 1865 में बनी थी। यहीं कांग्रेस की जिला इकाई के गठन को लेकर महत्वपूर्ण बैठक होने का भी उल्लेख मिलता है।
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1929 में फिर बस्ती आए थे गांधी जी
गांधी जी का बस्ती से यह जुड़ाव यहीं समाप्त नहीं हुआ। ऐतिहासिक दस्तावेजों में महात्मा गांधी 8 अक्टूबर 1929 को दोबारा बस्ती में आए थे। अगले दिन यानी 9 अक्टूबर को हथियागढ़ रेहार के मैदान में उन्होंने विशाल सभा को संबोधित किया। इस दौरान जिले की जनता की ओर से उन्हें पांच हजार रुपये की थैली भेंट किया गया था।
