चाक की रफ्तार से रोशन होगी दिवाली, बस्ती में दिन-रात दीये गढ़ रहे कुम्हार
बस्ती में कुम्हार दीपावली के लिए दिन-रात मिट्टी के दीये बनाने में जुटे हैं, ताकि लोगों के घरों के साथ ...और पढ़ें
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HighLights
बस्ती में कुम्हार दीपावली के लिए दिन-रात दीये बना रहे हैं।
मुस्कान और सीमा जैसी युवा लड़कियां भी दीये बनाने में जुटी हैं।
पारंपरिक कला को जीवित रखने और कारीगरों को समर्थन देने की अपील।
संवाद सूत्र, बस्ती। दीपावली का त्योहार नजदीक है । इस अवसर पर कुम्भकार दिन रात मिट्टी के दीये बनाने में जुटे हुए हैं। जब लोग अपने घर पर दीये जलाएंगे,तो कुम्भकारों के घर भी रोशन होंगे। विकास खंड रामनगर के बारहकोनी गांव में की सोलह वर्षीय मुस्कान पुत्री दिलीप व सीमा पुत्री भगवती ने यह साबित कर दिया है कि लड़कियां किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है। मुस्कान के पिता दिलीप व माता कविता के साथ दीये बनाने में जुट गई है।
मुस्कान ने बताया पिता दिलीप गांव -गांव जाकर दीयों की बिक्री करते हैं,जब कि वह मां के साथ दीये बनने में जुटी हुई हैं। इसी गांव के बगल में सीमा पुत्री भगवती चाक पर दीये बना रही थी। भाई प्रदीप ने बताया पहले तो मिट्टी आसानी से मिल जाता था। तालाब व पोखरा पट्टा हो जाने के कारण मिट्टी मिलना मुश्किल हो गया। इस बार अब तक करीब 70 हजार दीये बना लिए गए हैं। अब तक करीब तीस हजार रुपए कंडा व लकड़ी खरीद चुके हैं।
दीपक थोक में डेढ़ रुपये और फुटकर में ढाई रुपये की दर से बेचें जा रहे हैं। सीमा व मुस्कान ने बताया माता पिता के साथ काम करते- करते मिट्टी के दीये बनाना सीखा हैयह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, जिसमें लोग मिट्टी के दीपक बेंचकर अपनी जीविका चलाते हैं। इस बार वर्षा हो जाने से दीये धूप में सूख नहीं पाएं हैं।
चाक पर आकार ले रही मिट्टी, कुम्हारों की मेहनत से रोशन होंगे घर-आंगन
रुधौली विकास क्षेत्र के सुरवार कला आधुनिकता के दौर में भी मिट्टी के दीयों की अपनी अलग पहचान और महत्व बना हुआ है। कुम्हार अपनी पारंपरिक कला को जीवित रखने के लिए चाक पर मिट्टी को आकार देकर सुंदर-सुंदर दीये तैयार करने में जुटे हुए हैं। चाक की घूमती रफ्तार के साथ मिट्टी को नया आकार दिया जा रहा है। कुम्हार की मेहनत और हुनर से मिट्टी के साधारण ढेर सुंदर दीयों का रूप ले रहे हैं।
मिट्टी के दीये भारतीय संस्कृति और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बिजली की झालरों और आधुनिक सजावटी सामान के बढ़ते चलन के बावजूद मिट्टी के दीयों की मांग और आकर्षण बरकरार है। जरूरत है कि लोग मिट्टी के दीये खरीदकर स्थानीय कारीगरों का उत्साह बढ़ाएं ताकि पारंपरिक कला और कुम्हारों का रोजगार दोनों सुरक्षित रह सकें।
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