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न बोल सकती हैं न सुन सकती हैं, फिर भी एशियन पैसिफिक डेफ एथलेटिक्स में चमकीं बरेली की रिदम; जीते दो स्वर्ण पदक

Published: Fri, 16 Oct 2026 06:15 AM (IST)

अंतरराष्ट्रीय एथलीट रिदम शर्मा ने मलेशिया में एशियन पैसिफिक डेफ एथलेटिक्स चैंपियनशिप में दो स्वर्ण पदक जीते। उनकी मां ने ...और पढ़ें

मां पूनम शर्मा के साथ एथलीट रिदम शर्मा। जागरण

मां पूनम शर्मा के साथ एथलीट रिदम शर्मा। जागरण

HighLights

  1. एशिया पैसिफिक डेफ एथलेटिक्स चैंपियनशिप में लगातार दूसरे साल हासिल की उपलब्धि

जागरण संवाददाता, बरेली। देश की बेटी व शहर की शान अंतरराष्ट्रीय एथलीट रिदम शर्मा बोलने और सुनने में असमर्थ होने के बावजूद अपनी प्रतिभा से लगातार सफलता हासिल कर रही हैं।

मलेशिया में आयोजित एशियन पैसिफिक डेफ एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2026 में उन्होंने दो स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। बेटी को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के लिए मां पूनम शर्मा ने अपनी कान की बाली तक बेच दी।

रिदम की सफलता संघर्ष, मेहनत और परिवार के समर्पण की कहानी है। रिदम बोल नहीं पाती तो वह इशारों में अपनी बात कहती हैं। उनकी मां के माध्यम से रिदम से जागरण संवाददाता मनीस पांडेय ने बात की।

मलेशिया में दो स्वर्ण पदक जीतने के बाद कैसा महसूस हो रहा है।

लगातार दूसरे साल अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में दो स्वर्ण पदक जीतकर बहुत खुशी हुई है। मैंने 400 मीटर दौड़ और 100 गुणा 400 मीटर रिले रेस में स्वर्ण पदक जीते। प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करना मेरे लिए गर्व की बात है।

मलेशिया में प्रतियोगिता के दौरान क्या अनुभव रहा।

वहां खिलाड़ियों के लिए व्यवस्थाएं अच्छी थीं। बस से मैदान जाते समय पुलिस की गाड़ी कार व बाइक आगे चलती थी, जो यातायात को नियंत्रित करती थी।

इससे खिलाड़ी समय पर पहुंच जाते थे। यह सम्मान पाकर बहुत अच्छा महसूस हो रहा था। अपने यहां कई बार यातायात में फंसने के कारण अभ्यास और मैच में देरी हो जाती है।

वहां खाने-पीने और घूमने का अनुभव कैसा रहा।

शुद्ध शाकाहारी भोजन मिलने में थोड़ी परेशानी हुई। हालांकि, दाल, चावल और पनीर मिल जाता था। वहां के शापिंग माल में भी गई। मलेशिया की मुद्रा रिंगिट भारतीय रुपये के मुकाबले काफी महंगी लगी।

जेब खर्च के लिए घर से 1500 रुपये लेकर गई थी, एक दर्जन केले व चार सेब खरीदने में 827 रुपये खर्च हो गए। इसलिए खरीदारी में सावधानी बरतनी पड़ी।

खेल के अलावा आपकी क्या रुचियां हैं।

मुझे फिल्में देखना पसंद है। खासकर दक्षिण भारतीय फिल्मों को उनके दृश्यों के माध्यम से समझने की कोशिश करती हूं। मैं दैनिक जागरण अखबार भी नियमित रूप से पढ़ती हूं। आगे खेल कोटे से सरकारी नौकरी पाना चाहती हूं, जिससे खेल जारी रख सकूं।

आपकी सफलता में परिवार का कितना योगदान है।

रिदम की मां पूनम शर्मा: बेटी को आगे बढ़ाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। बेंगलुरु में ट्रायल के लिए भेजने के दौरान खर्च जुटाने को अपनी कान की बाली बेचनी पड़ी।

मलेशिया भेजने, जूते-कपड़े खरीदने और स्वास्थ्य जांच सहित पूरी प्रक्रिया में करीब डेढ़ लाख रुपये खर्च हुए। अब अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए फिर से लोगों से मदद मांगनी होगी।

खिलाड़ियों को पर्याप्त आर्थिक सहायता और पुरस्कार राशि मिलनी चाहिए, ताकि प्रतिभाशाली बच्चे आर्थिक परेशानी के कारण पीछे न रह जाएं।

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