पोल्ट्री सेक्टर में क्रांति लाएगा CARI का नया शोध, अब अंडों से सिर्फ मादा चूजे ही निकलेंगे, किसानों की होगी मोटी कमाई
केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (CARI) अपने स्थापना दिवस पर पोल्ट्री उद्योग में महत्वपूर्ण योगदान और उपलब्धियों को उजागर कर रहा ...और पढ़ें

केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान।
HighLights
दो नवंबर 1979 को आइसीएआर से मिला एक स्वतंत्र पूर्ण संस्थान का दर्जा
जागरण संवाददाता, बरेली। अंडा उत्पादन में आत्मनिर्भरता हो या कम लागत में मुर्गी पालन से किसानों की आय बढ़ाने का लक्ष्य, केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (सीएआरआइ) भारतीय पोल्ट्री उद्योग की रीढ़ बनकर उभरा है। 1939 में एक छोटी सी शोध इकाई के रूप में शुरू हुआ संस्थान आज एशिया के प्रमुख कुक्कुट अनुसंधान केंद्रों में शामिल है।
दो नवंबर को संस्थान अपना स्थापना दिवस मना रहा है। इस मौके पर इसकी उपलब्धियों के साथ भविष्य की वैज्ञानिक चुनौतियों पर भी सभी की नजरें हैं।
सीएआरआइ की शुरुआत 11 मार्च 1939 को भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आइवीआरआइ) के अंतर्गत पोल्ट्री रिसर्च इकाई के रूप में हुई थी।
वर्ष 1970 के दशक में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के सहयोग से यहां सेंटर आफ एक्सीलेंस इन पोल्ट्री साइंस की स्थापना हुई।
वर्ष 1971 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) ने कुक्कुट अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए समन्वित शोध परियोजना शुरू की।
इसके बाद दो नवंबर 1979 को सीएआरआइ को स्वतंत्र संस्थान का दर्जा मिला। तब से यह संस्थान नस्ल सुधार, आनुवंशिकी, प्रजनन, पोषण और कुक्कुट प्रबंधन के क्षेत्र में लगातार काम कर रहा है।
मादा चूजे तैयार करने की तकनीक पर शोध
पोल्ट्री उद्योग की बड़ी चुनौती लेयर फार्मिंग में पैदा होने वाले नर चूजों का प्रबंधन है। अंडा उत्पादन में उपयोग नहीं होने के कारण इनका निस्तारण करना पड़ता है।
इस समस्या के समाधान के लिए संस्थान में इन-ओवो सेक्सिंग और जेंडर स्पेसिफिक तकनीक पर शोध किया जा रहा है। इसका उद्देश्य अंडे के भीतर ही चूजे के लिंग की पहचान कर ऐसी व्यवस्था विकसित करना है।
जिससे केवल मादा चूजों का उत्पादन संभव हो सके। तकनीक सफल होने पर नर चूजों के निस्तारण की समस्या कम होगी और किसानों की लागत में भी कमी आएगी।
सोनाली से कड़कनाथ तक नस्लों की लंबी श्रृंखला
संस्थान की प्रमुख उपलब्धियों में उन्नत कुक्कुट नस्लों का विकास शामिल है। कैरी सोनाली, कैरीप्रिया और कैरी समृद्धि जैसी नस्लों ने अंडा और मांस उत्पादन के क्षेत्र में किसानों को नए विकल्प दिए हैं।
कैरी सोनाली सालभर में लगभग 280 अंडे देने की क्षमता रखती है। वहीं, कैरीप्रिया ग्रामीण और आधुनिक दोनों तरह के वातावरण में अनुकूल मानी जाती है। कैरी समृद्धि तेजी से वजन बढ़ाने वाली नस्ल है।
इसके अलावा कैरी निर्भीक, कैरी श्यामा, कैरी देवेंद्र और कैरी धनराजा जैसी नस्लें ग्रामीण कुक्कुट पालन को बढ़ावा दे रही हैं। संस्थान में कड़कनाथ और असील जैसी देशी प्रजातियों का संरक्षण और संवर्धन भी किया जा रहा है।
टर्की की कैरी विराट, ब्लैक और चित्तला, बटेर की कैरी सैनहरी, स्वेता और उत्तम, गिनी फाउल की कैरीपर्ल कदाबरी भी संस्थान की उपलब्धियों में शामिल हैं।
बटेर पालन से बढ़ेंगे स्वरोजगार के अवसर
मुर्गी पालन के अलावा बटेर और गिनी फाउल पालन को भी ग्रामीण आय का विकल्प बनाया जा रहा है। सीएआरआइ शोध के साथ किसानों और युवाओं को प्रशिक्षण भी देता है।
साल में आठ से नौ बार लघु औद्योगिक प्रशिक्षण कार्यक्रम में चूजों का पालन, टीकाकरण, बीमारियों से बचाव, पोषण और व्यावसायिक मुर्गी पालन की जानकारी दी जाती है। पोल्ट्री साइंस में परास्नातक और डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी संचालित किए जाते हैं।
जलवायु अनुकूल नस्लें तैयार करने पर जोर
बदलते मौसम और बढ़ते तापमान को देखते हुए संस्थान ऐसी नस्लों के विकास पर काम कर रहा है, जो 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान में भी उत्पादन क्षमता बनाए रख सकें।
कम पानी और सीमित संसाधनों में बेहतर उत्पादन इसका प्रमुख लक्ष्य है। इसके साथ ही एग बिस्कुट, एग पेड़ा, एग कुल्फी और चकली जैसे उत्पाद अंडे के उपयोग के नए रास्ते खोल रहे हैं।
अंडों के सुरक्षित परिवहन और भंडारण के लिए एग शील्ड तकनीक भी विकसित की गई है। स्थापना दिवस पर सीएआरआइ का 87 वर्षों का सफर विज्ञान, नवाचार और किसानों की समृद्धि के साझा संकल्प की कहानी है।
सीएआरआइ का लक्ष्य उन्नत शोध के माध्यम से पोल्ट्री क्षेत्र को ग्रामीण स्वावलंबन का आधार बनाना है। हम 'सिर्फ मादा चूजे' और 'क्लाइमेट-रेजिलिएंट' नस्लों जैसी अत्याधुनिक तकनीकों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, ताकि किसानों की लागत घटे और उपभोक्ताओं को सुरक्षित व उच्च गुणवत्ता वाला पोषण मिल सके।
- डाॅ. जगबीर सिंह त्यागी, कार्यवाहक निदेशक, सीएआरआइ
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